Tuesday, March 16, 2010

नवगीत - कुछ तो कहीं हुआ है



कुछ तो कहीं हुआ है, भाई
कुछ तो कहीं हुआ है
झमझम बारिश है बसंत में
सावन में पछुआ है
कुछ तो कहीं हुआ है

हुई कूक कोयल की गायब
बौर लदी अमराई गायब
सरसों फूली सहमी-सहमी
फागुन से अँगड़ाई गायब
मौसम-चक्र पहेली जैसा
मानव ज्यों भकुआ है
कुछ तो कहीं हुआ है

जीवन से जीविका बड़ी है
मन, मौसम में जंग छिड़ी है
मानव का अस्तित्त्व गौण है
नास्डॉक पर नज़र गड़ी है
पीछे गहरी खाँई उसके
आगे पड़ा कुआँ है
कुछ तो कहीं हुआ है

तुलसी-सूर-कबीर कहाँ तक
देगें साथ फ़कीर कहाँ तक
घोर कामना के जंगल में
राह दिखायें पीर कहाँ तक
राम नाम जिह्वा पर लेकिन
चिन्तन में बटुआ है
कुछ तो कहीं हुआ है


-- अमित
नास्डॉक = नैज़्डॉक = NASDAQ = National Association of Securities Dealers Automated Quotations
भकुआ (देशज शब्द) = हतबुद्धि।

Saturday, March 13, 2010

ग़ज़ल - बजाहिर खूब सोना चाहता हूँ



बजाहिर खूब सोना चाहता हूँ
हक़ीक़त है कि रोना चाहता हूँ


अश्क़ आँखों को नम करते नहीं अब
जख़्म यादों से धोना चाहता हूँ


वक़्त बिखरा गया जिन मोतियों को
उन्हे फिर से पिरोना चाहता हूँ


कभी अपने ही दिल की रहगुजर में
कोई खाली सा कोना चाहता हूँ


नई शुरूआत करने के लिये फिर
कुछ नये बीज बोना चाहता हूँ।


गये जो आत्मविस्मृति की डगर पर
उन्ही में एक होना चाहता हूँ।


भेद प्रायः सभी के खुल चुके हैं
मैं जिन रिश्तों को ढोना चाहता हूँ


नये हों रास्ते मंजिल नई हो
मैं इक सपना सलोना चाहता हूँ।


’अमित’ अभिव्यक्ति की प्यासी जड़ो को
निज अनुभव से भिगोना चाहता हूँ।

Friday, March 12, 2010

एक मुक्तक दो सन्दर्भ

कभी एक मुक्तक श्रृंगार का लिखा था| बाद में परिवेश बदला सन्दर्भ बदले तो सौंदर्य के प्रतिमान भी बदले| पहले मुक्तक में शास्त्रीय अलंकरण हैं| बाद में इसे मैंने आज के परिदृश्य में रखना चाहा तो इसमे सौन्दर्य की जगह हास्य उत्पन्न हो गया| आप स्वयं देखें और निर्णय दें|
(१९९१)
गाँव ख़ुशबू का बस गया होगा, तुम जहाँ फूल से खिले होगे
रस्ते-रस्ते  मचल उठे होंगे, जिनपे  तुम दो कदम चले होगे
नूपुर औऽ हार, कंगन औऽ काजल, भाग्य अपना सराहते होंगे
वो तो पागल ही हो गया होगा जिससे तुम एक पल मिले होगे

(२०१०)
मॉल ख़ुशबू का बन गया होगा, तुम जो परफ़्यूम से खिले होगे
सारे रस्ते मचल उठे होंगे,  जिनपे  तुम  कार  से चले होगे
जींस और टॉप, चस्मा औऽ सेल्युलर भाग्य अपना सराहते होंगे
वो तो बेमौत मर गया होगा जिससे तुम हाय! कर चले होगे


--अमित 

Sunday, March 7, 2010

गज़ल - थोड़े मतभेद हो गये


थोड़े मतभेद हो गये
निष्ठा में छेद हो गये

रक्त-संग रक्त थे मगर
निकले तो स्वेद हो गये

आई जब इश्क़ की समझ
बाल ही सफ़ेद हो गये

अनपढ़ के अटपटे वचन
समझा तो वेद हो गये

ऐसा कुछ हो गया 'अमित'
अपने ही खेद हो गये



अमित

Saturday, March 6, 2010

एक क़ता

दिल न होने से तो पत्थर का भी दिल अच्छा है
नाला-ए-हक़ पे किसी रोज़ धड़क सकता है
पौध शोलों की लगाने से पेशतर सोचो
कभी ये अपने भी दामन में भड़क सकता है


अमित
नाला-ए-हक़ = सत्य की चीत्कार

Thursday, March 4, 2010

एक आरम्भिक कविता

पुरानी डायरी के पन्नों से आरम्भिक काल की एक कविता मिल गई है। आप से बाँटने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। आप देख कर जान ही जायेंगे कि शैली जय शंकर प्रसाद जी से प्रभावित है।

आज भी वहीं खड़ा उद्दीप्त
विश्वधारा में मैं निरुपाय
खोजता हूँ बस एक आलम्ब
यजन करने का तुच्छ उपाय

निशा है आज हुई शशि-मुक्त
किरण भी आशा की है लुप्त
जानता होगा विश्वाधार
जीव  फिर
क्यों शरीर से युक्त

संकलित है स्मृति अवशेष
भग्न उस रेत-भीति के चिह्न
जिसे देने को नूतन रूप
हो गये थे दो पथिक अभिन्न

जीव का प्रेम जीव से किन्तु
शरीरों का कैसा भ्रम जाल
रहा करता जल सागर मध्य
हो सका क्या जलगत पाताल

हवा गति हेतु चाहती दाब
नदी को नीचे तल की चाह
किन्तु भौतिक नियमों से दूर
भावनाओं का अतुल प्रवाह

जिसे पाने में लगते वर्ष
बीत जाते कितने मधुमास
वही क्षण रुकते यदि पल चार
न हटता मन से निज विश्वास

हो गई उषा भी तमलिप्त
खो गया उसका भी अभिमान
क्षितिज के बीच बैठती कभी
पहनकर कुछ अरुणिम परिधान

इन्दु ने अपनी किरण समेट
समय से पूर्व किया प्रस्थान
साथ देने तारा-नक्षत्र
हो गये हैं सब अन्तर्ध्यान

इस अंधेरे में किसी के नाम का दीपक जलाये
ढूँढता बिछड़े स्वजन को भूल वो इस राह आये

भूल वो इस राह आये।
अमित (१६ नवम्बर १९८०)

Tuesday, February 23, 2010

ग़ज़ल - एक मासूम से ख़त पर बवाल कितना था

एक मासूम से ख़त पर बवाल कितना था
उस हिमाकत का मुझे भी मलाल कितना था

मेरे हाथों पे उतर आई थी रंगत उसकी
सुर्ख़ चेहरे पे हया का गुलाल कितना था

मैं अगर हद से गुजर जाता तो मुज़रिम कहते
और बग़ावत का भी दिल में उबाल कितना था

काँच सा टूट गया कुछ मगर झनक न हुई
जुनूँ में भी हमें सबका ख़याल कितना था

हश्र यूँ मेरे सिवा जानता था हर कोई
मैं अपने हाल पे ख़ुद ही निहाल कितना था

आज भी एक पहेली है मेरे सिम्त 'अमित'
उस तबस्सुम की गिरह में सवाल कितना था

अमित
शब्दार्थ: मुक़द्दस हिलाल = पवित्र नया चाँद, तबस्सुम = मुस्कान

Friday, February 19, 2010

ग़ज़ल - बहुत सहज हो जाने के भी अपने खतरे हैं|

बहुत सहज हो जाने के भी अपने ख़तरे हैं
लोग समझने लगते हैं हम गूँगे-बहरे हैं

होरी को क्या पता नहीं, उसकी बदहाली से
काले ग्रेनाइट पर कितने हर्फ़ सुनहरे हैं

धड़क नहीं पाता मेरा दिल तेरी धड़कन पर
मंदिर-मस्ज़िद-गुरुद्वारों के इतने पहरे हैं

पढ़-लिख कर मंत्री हो पाये, बिना पढ़े राजा
जाने कब से राजनीति के यही ककहरे हैं

निष्ठा को हर रोज़ परीक्षा देनी होती है
अविश्वास के घाव दिलों में इतने गहरे हैं

मैं रोया तो नहीं नम हुई हैं फिर भी आंखें
और किसी के आँसू इन पलकों पर ठहरे हैं

बौनो की आबादी में है कद पर पाबन्दी
उड़ने लायक सभी परिन्दो के पर कतरे हैं



अमित

Wednesday, February 10, 2010

गज़ल - इक लम्हा खु़शी के लिये दुनिया सफ़र में है (पुरानी)

१९८६-८७ में लिखी गयी गज़ल प्रेषित कर रहा हूँ|
इक लम्हा खु़शी के लिये दुनिया सफ़र में है
मालूम नहीं दर तेरा किस रहगुजर में है

मुरझा चुकी हैं खिल के तमन्नायें नामुराद
गोया हमारा दिल भी किसी तंग दर में है

मैं भी बुझूँगा एक दिन और तू भी आफ़ताब
फिर इतनी तपिश क्यूँ तेरी तिरछी नज़र में है

फ़ित्रत है एक जैसी सितारों की जमी की
इक जल रहे हैं दूसरी जलते शहर में है

ऐ तालिबाने-फ़िरक़ापरस्ती कभी तो सोच
ये आग फूँक देगी जो कुछ तेरे घर में है

हम आये मदावाये-दिलआज़ुर्दः को 'अमित'
इक वहशियाना भूक मिरे चाराग़र में है

अमित (१९८६)

तालिबाने-फ़िरक़ापरस्ती = साम्प्रदायिकता के विद्यार्थीगण। मदावाये-दिलआज़ुर्दः = दुखी हृदय के उपचार के लिये। चाराग़र=उपचारक, वैद्य।

Monday, January 25, 2010

अहम की ओढ़ कर चादर

अहम की ओढ़ कर चादर
फिरा करते हैं हम अक्सर

अहम अहमों से टकराते
बिखरते चूर होते हैं
मगर फिर भी अहम के हाथ
हम मजबूर होते हैं
अहम का एक टुकड़ा भी
नया आकार लेता है
ये शोणित-बीज का वंशज
पुनः हुंकार लेता है
अहम को जीत लेने का
अहम पलता है बढ़-चढ़ कर
अहम की ओढ़ कर .....

विनय शीलो में भी अपनी
विनय का अहम होता है
वो अन्तिम साँस तक अपनी
वहम का अहम ढोता है
अहम ने देश बाँटॆ हैं
अहम फ़िरकों का पोषक है
अहम इंसान के ज़ज़्बात का भी
मौन शोषक है
अहम पर ठेस लग जाये
कसक रहती है  जीवन भर
अहम की ओढ़ करे चादर ...

-- अमित

Wednesday, January 20, 2010

हे! हिन्दी के रुद्रावतार! वन्दन है!

आज बसन्त पंचमी है। महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' जी का जन्म-दिन। निराला जी के जन्मवर्ष और दिन के बारे में ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है लेकिन जन्मदिन उनका बसंत को ही मनाया जाता है। आज के ही दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती जी की पूजा होती है। शिक्षण संस्थाओं मे विशेष रूप से। बंगाल में इसे बहुत समारोह पूर्वक मनाते हुये मैने देखा था।
यह दिन सरस्वती के इस वरदपुत्र का भी जन्मदिन हैं। महाप्राण के प्रति श्रद्धा के कुछ शब्द बन गये हैं उन्हे आपके सम्मुख रख कर उस महामनीषी के प्रति मैं अपनी कृतज्ञता ज्ञापित कर रहा हूँ। स्पष्ट कर दूँ कि, उस व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने के लिये मेरी कलम बहुत छोटी है।

हे! हिन्दी के रुद्रावतार!
भाषानिधि अम्बुधि महाकार
कविता-नवीन के शिल्पकार
जीवनी शक्ति जो दुर्निवार
अर्पित तुमको यह पुष्पहार
चन्दन है!

गंगा-यमुना उच्छ्‍वसित धार
कहती निजस्मृति को उघार
तुमसे भवाब्धि भी गया हार
हे पुरुष केशरी नमस्कार
करता युग तुमको बार-बार
वन्दन है!

जड़ता-गज-मस्तक पर प्रहार
कर, सिंहनाद सा स्वर उचार
वह नई चेतना, नव प्रसार
कविता जब पहुँची दीन-द्वार
स्लथ भिक्षुक की बेबस पुकार
क्रन्दन है!

उद्भट ज्ञानी थे तुम भगवद्गीता के
देखे कैसे रामाभ नयन सीता के
झेले थे तुमने विरह स्वपरिणीता के
संतप्त-शोक निज-कन्या सुपुनीता के
कवि अश्रु तुम्हारा, अश्रु नहीं
अंजन है!

हे! सरस्वती के पुत्र, स्वयं चतुरानन
ने गढ़ा तुम्हे देकर गर्वीला आनन
लेखनी-विराजे आकर स्वयं गजानन
वपु जैसे कवि का रूप धरे पंचानन
बिखरी कविता-कौमुदी-कीर्ति जिस कानन
नन्दन है!

हे! हिन्दी के रुद्रावतार
वन्दन है!


अमित

Tuesday, January 19, 2010

एक सवैया (मत्तगयन्द)

संगम क्षेत्र को देख कर एक सवैया फूट पड़ा।
मत्तगयन्द सवैया में सात भगण (ऽ। ।) और और अन्त में दो गुरु होते हैं।
भानुसुता इस ओर बहे, उस ओर रमापति की पगदासी।
साधक सिद्ध सुजान जहाँ, रहते भर मास प्रयाग प्रवासी।
संगम तीर जुटे जब भीर, लगे जन वारिधि की उपमा सी।
धन्य हुआ यह जीवन जो, इस पुण्य धरा का हुआ अधिवासी।


अमित