Friday, January 7, 2011

ग़ज़ल - किसी को इतना न चाहो के बदग़ुमा हो जाय


किसी को इतना न चाहो के बदगुमाँ हो जाय
न लौ को इतना बढ़ाओ के वो धुआँ हो जाय

ग़र हो परवाज़ पे पहरा ज़ुबाँ पे पाबन्दी
तो फिर क़फ़स ही मेरा क्यों न आशियाँ हो जाय

न चुप ही गुज़रे न रोकर शबे-फ़िराक़ कटे
तू एक झलक दिखा कर जो बेनिशाँ हो जाय

लोग लेते हैं मेरा नाम तेरे नाम के साथ
कल ये अफ़वाह ही बढ़ कर न दास्ताँ हो जाय

ख़ुशमिज़ाजी भी तेरी मुझको डरा देती है 
तेरा मज़ाक रहे, मेरा इम्तेहाँ हो जाय

सितमशियार कई और हैं तुम्हारे सिवा
कहीं न दर्द मेरा, दर्दे-ज़ाविदाँ हो जाय

भीख में इश्क़ भी मुझको नहीं कुबूल 'अमित'
भले वो जाने-सुकूँ मुझसे सरगिराँ हो जाय

अमित

शब्दार्थ:  परवाज़ = उड़ान, क़फ़स = पिंजरा, शबे-फ़िराक़ = वियोग की रात, सितमशियार = अत्याचार करने वाला/वाले, दर्दे-ज़विदाँ = स्थाई दर्द जो मृत्यु के साथ ख़त्म होता है, जाने-सुकूँ = शान्ति प्रदान करने बाला प्रिय-पात्र, सरगिराँ = रुष्ट, नाख़ुश।

Saturday, January 1, 2011

नव-वर्ष २०११ मंगलमय हो!

नव-छन्द सजे नव-गीत रचें नव-बिम्ब सुसज्जित काव्य-कला
सब रागिनियाँ मनुहार करें नव-बीन गहें कर में विमला
नववर्ष प्रहर्ष प्रदायक हो जग-प्रीति सुनीति रहे सुफला
तन-ताप मिटे मन-मोद बढ़े नित कोष भरें घर में कमला
'अमित'

Wednesday, December 29, 2010

गीत - फिर क्यों मन में संशय तेरे!



फिर क्यों मन में संशय तेरे!

जब-जब दीप जलाये तूने

दूर हुये हैं घने अंधेरे
फिर क्यों मन में संशय तेरे!

स्वयं शीघ्र धीरज खोता है
क्रोध! कि ऐसा क्यों होता है
नियति नवाती शीश उसी को
जो सनिष्ठ इक टेक चले रे
फिर क्यों मन में संशय तेरे!

वीर पराजित हो सकते हैं
जय की आस नहीं तजते हैं
निश्प्रभ होकर डूबा सूरज 
तेजवन्त हो उगा सवेरे
फिर क्यों मन में संशय तेरे!

जग में ऐसा कौन भला है
जिस पर समय न वक्र चला है
धवल-वर्ण हिमकर को भी तो
ग्रस लेते हैं तम के घेरे
फिर क्यों मन मे संशय तेरे!

मान झूठ अपमान झूठ है
जीवन का अभिमान झूठ है
जग-असत्य की प्रत्यंचा पर
सायक हैं माया के प्रेरे
फिर क्यों मन में संशय तेरे!


--अमित

Sunday, December 26, 2010

गीत - सपनों को कल रात जलाया



सपनों को कल रात जलाया

हर करवट पर चुभते थे जो
घुटन  बढ़ाते घुटते  थे जो
मुझे पीसते पिसते  थे जो
रोते कभी सिसकते थे जो
मन पर भारी पत्थर रख कर
उन्हें विदा का शीश नवाया
सपनों को कल रात जलाया

सुबह राख़ से झाँक रहे थे
मुझ विस्मित को ताक रहे थे
मेरे मन को आँक रहे रहे थे
मन की दरकन टाँक रहे थे
उनकी मन्दस्मित रेखा से 
मन ही मन मैं बहुत लजाया
सपनो को कल रात जलाया

सपनों में संवाद छिड़ा है
और बीच में मौन खड़ा है
जीवन बड़ा कि स्वप्न बड़ा है
तर्कों का इक बोझ पड़ा है
स्वप्न-प्रलोभन में आकर के
मैंने ही ख़ुद को भरमाया
सपनों को कल रात जलाया

स्वप्नों से अब बोल रहा हूँ
मन की पीड़ा खोल रहा हूँ
अच्छे शब्द टटोल रहा हू
हर अवसर को तोल रहा हूँ
स्वप्नों मुझे छोड़ दो भाई
आर्तनाद कर मैं चिल्लाया
सपनो को कल रात जलाया

लेगा कोई ज़िम्मेदारी?
स्वप्नों की दे रहा सुपारी
मैंने तो ये बाज़ी हारी
जीत गया फिर वक़्त शिकारी
रक्तबीज के वंशज स्वप्नों
मुझको ही क्यों लक्ष्य बनाया
सपनों को कल रात जलाया

--अमित

Sunday, November 21, 2010

एक सरल सा गीत





आओ साथी जी लेते हैं
विष हो  या अमृत हो जीवन
सहज भाव से पी लेते हैं

सघन कंटकों भरी डगर है
हर प्रवाह के साथ भँवर है
आगे हैं संकट अनेक, पर
पीछे हटना भी दुष्कर है।
विघ्नों के इन काँटों से ही
घाव हृदय के सी लेते हैं
आओ साथी जी लेते है

नियति हमारा सबकुछ लूटे
मन में बसा घरौंदा टूटे
जग विरुद्ध हो हमसे लेकिन
जो पकड़ा वो हाथ न छूटे
कठिन बहुत पर नहीं असम्भव
इतनी शपथ अभी लेते हैं
आओ साथी जी लेते है

श्वासों के अंतिम प्रवास तक
जलती-बुझती हुई आस तक
विलय-विसर्जन के क्षण कितने
पूर्णतृप्ति-अनबुझी प्यास तक
बड़वानल ही यदि यथेष्ट है
फिर हम राह वही लेते हैं
आओ साथी जी लेते हैं

--अमित 

Thursday, November 4, 2010

दीपावली पर दो छन्द शार्दूलविक्रीड़ित के


शार्दूलविक्रीड़ित


यह १९ वर्णों का गणात्मक, यत्यात्मक वार्णिक छंद है जिसमें १२वें एवं १९वें वर्ण पर यति होती है
गणों का क्रम इस प्रकार है। (इस प्रगल्भता के लिये क्षमा करेंगे और यदि कोई त्रुटि हो तो अवश्य इंगित करें। प्रसिद्ध सरस्वती वन्दना- 'या कुन्देन्दु तुषार हार.... ' इसी छंद में है)


मगण सगण जगण सगण, तगण तगण गुरु
ऽऽऽ   ।। ऽ  ।ऽ।   ।।ऽ    ऽऽ।  ऽऽ।   ऽ 

जागी श्याम-विभावरी शुभकरी, दीपांकिता वस्त्रिता
कल्माशांतक ज्योति शुभ्र बिखरी, आलोकिता है निशा
ज्योतिष्मान स्वयं प्रतीचिपट से, सन्देश देता गया
दीपों की अवली प्रदीप्त कर दे, संपूर्ण पुण्या धरा

राकानाथ निमग्न हैं शयन में, तारावली दीपिता
तारों का प्रतिबिम्ब ही अवनि में, दीपावली सा बना
लक्ष्मी भी तज क्षीर-धाम उतरीं, देखी जु शोभा घनी
देतीं सी सबको प्रबोध मन में, जैसे सुसंजीवनी


-अमित


Tuesday, November 2, 2010

तीन मुक्तक


होली से 
दीवाली तक 























आत्म-केन्द्रित जग सीमित है अपनी ही खुशहाली  तक
अर्थहीन     शब्दों  से    लेकर  चिन्तन   की कंगाली तक
ऋतु-परिवर्तन     भी  शायद इनको  परिभाषित करता हो
जब   रिश्तों  की    मीयादें     हों   होली  से  दीवाली  तक

मेरी    जाती    कमी से लगते हो
किसी    खोई    ख़ुशी से लगते हो
जब से दुश्मन से मिलके आये हो
दोस्त, तुम अज़नबी से लगते हो


कुछ बातों कुछ संकेतों को प्यार समझ बैठे थे हम
कुछ वादों को जीवन का आधार समझ बैठे थे हम
नया  नहीं कुछ हुआ, भरोसे  टूटा करते  आये  हैं,

हाँ, उधार को ग़लती से उपहार  समझ बैठे थे हम

-अमित

Wednesday, October 13, 2010

स्वगत - २

दुस्तर अगाध भवनिधि में
है दिवास्वप्न की तरणी
शत घूर्णावर्त तरंगे
मथ देतीं जैसे अरणी

पथ निन्दित या अभिनन्दित
संकल्प-विकल्प-अनिश्चय
निज-कर्म-विपाक करेगा
किस पाप-पुण्य का संचय

ज्यों सूक्ष्म भार अंतर से
हो स्वर्ण-तुला में दोलन
लघु लाभ-हानि की गणना
करती मन में आड़ोलन

हैं सुख के क्षण उल्का से
जीवन की अमा-निशा में
तारक-मणियों से मण्डित
नभ, यद्यपि सभी दिशा में

संघर्ष विषय-संयम का
लेता नित नई परीक्षा
प्रायः अनंग के शर से
हो गई बिद्ध गुरु-दीक्षा

विचलन ही है यदि प्रचलन
तब चलन अरक्षित ऐसे
स्वानों के संरक्षण में
हो भोज्य सुरक्षित जैसे

किस प्रेरक की इच्छा से
आकर्षण और विकर्षण
विपरीत वायु के बल से
होते देखा है वर्षण

उत्तर अनेक प्रश्नों का
बस मात्र एक चुप्पी है
सृष्टा की सब मर्यादा
आकर के यहीं छिपी है

अमित

Sunday, October 10, 2010

स्वगत - 1

माया विस्तीर्ण जगत की
छल की प्रपंच की छाया
प्रतिविम्ब न ठहरे क्षण भर
हिलती दर्पण की काया

कुछ सघन निराशा के पल
सुधियों से निज संघर्षण
हम समर छोडते फिरते
पर पीछे पड़ जाते रण

विश्वास-विटप उन्मूलित
कामना-कलित झंझा से
अंकुर-अभिलाषा फिर भी
क्यों भ्रूणहीन बंझा से

जैसे प्रवाल कोटर में
मत्स्या के चंचल फेरे
कुछ ध्वनियाँ आती-जाती
रहतीं मस्तके में मेरे

शीशे के नग को पहना
हीरक-मुद्रिका समझ कर
पर वह भी आत्म-विमोहित
जा निकला दूर छिटक कर

अनु्गूँज उठा करती है
प्रायः मानस-तलघर में
कुछ सघन तरंगे आकर
छा जातीं विश्वंकर में

चंचल मन बैठ न पाये
रख धैर्य-शिला पर आसन
उद्धत इंद्रियाँ तोड़तीं
मर्यादा का अनुशासन

अद्भुत रहस्य संकुल सा
मानव मन अगम पहेली
इच्छायें चपल नटी सी
करती रहतीं अठखेली
क्रमशः...

अमित
शब्दार्थ: विश्वंकर = आँख

Friday, September 24, 2010

नवगीत - एक प्रवासी



















लौट! घर चल मुसाफ़िर

कहाँ अब आसरा परदेश में है
यहाँ छल
का चलन हर वेश में है
नेह के नीर आँखों में नहीं हैं
स्वार्थ के रेशमी कल हर कहीं हैं
बहुत रोका तुझे
बरबस गया फिर
लौट! घर चल मुसाफ़िर

तेरा अधिवास तेरे गाँव में है
भले ही पेड़ की लघु छाँव में है
यहाँ कितना! बसेरे का किराया
दण्ड भी! यदि न वादे पर चुकाया
गया कोई तो
आया है नया फिर
लौट! घर चल मुसाफ़िर

शहर की याद होगी साथ तेरे
नियति की वर्तिका पर शलभ-फेरे
 
जहाँ घुमड़े कभी बादल घनेरे
वहीं मरुथल ने डाले आज डेरे
न आशा में कोई
दीपक जला फिर
लौट! घर चल मुसाफ़िर

Sunday, September 5, 2010

ग़ज़ल - तलाशे-इश्क़ में सारी उमर तमाम हुई

















तलाशे-इश्क़ मे सारी उमर तमाम हुई
आके दहलीज पे इक बेवफ़ा के शाम हुई

ग़मे-फ़िराक़, ग़मे-कार, ग़मे-तनहाई
ज़िन्दगी रोज़ नये हादिसों के नाम हुई

क़त्ल उम्मीद हुई लब से पयाला फिसला
मजाले-ज़ीस्त थी जो शै वही हराम हुई

कौन क्या राज़ छुपाये है किसे क्या मालूम
नवाये-नफ़स भी मेरी सदाये-आम हुई

पैकरे-ख़ाक को फिर खा़क में मिलना है ’अमित’
है ये अफ़सोस के मिट्टी मेरी बदनाम हुई
अमित
शब्दार्थः- ग़मे-फ़िराक़= वियोग का दुःख; ग़मे-कार= कार्य या उद्यम का दुःख; ग़मे-तनहाई=एकाकी होने का दुःख; हादिसों = दुर्घटनाओं, विपत्तियो; मजाले-ज़ीस्त = जीवन की शक्ति; नवाये-नफ़स=साँस की आवाज़; सदाये-आम=सामान्यजन की पुकार; पैकरे-ख़ाक=मिट्टी का शरीर।

Tuesday, July 13, 2010

ग़ज़ल - अब ’अमित’ अन्जुमन से जाते हैं






















बाइसे-शौक आजमाते हैं
कितने मज़बूत अपने नाते हैं

रोज़ कश्ती सवाँरता हूँ मैं
कुछ नये छेद हो ही जाते हैं

बाकलमख़ुद बयान था मेरा
अब हवाले कहीं से आते हैं

जिनपे था सख़्त ऐतराज़ उन्हे
उन्हीं नग़्मों को गुनगुनाते हैं

शम्मये-बज़्म ने रुख़ मोड़ लिया
अब ’अमित’ अन्जुमन से जाते हैं


'अमित' 
बाइसे-शौक = शौक के लिये,