Thursday, March 5, 2009

गीत - कैसी हवा चली उपवन में ... ....

कैसी हवा चली उपवन में सहसा कली-कली मुरझाई।
ईश्वर नें निश्वास किया या विषधर ने ले ली जमुहाई।
कैसी हवा चली उपवन में ... ....

साँझ ढले पनघट के रस्ते, मिली हुई क्या बात न जानें,
सिर का घड़ा गिरा धरती पर, हँसनें का आवेग न मानें,
हँसते-हँसते आँसू छलके, गालों का रक्तिम हो जाना,
मद्यसिक्त स्वर में धीरे से, ’धत्’ कहके आगे बढ़ जाना,
स्वप्न नहीं सच था परन्तु अब बात हो गई सुनी सुनाई।
कैसी हवा चली उपवन में ... ....

कुछ प्रसंग जीवन में आये, बन कर याद अतीत हो गये,
परिचय गाढ़ा हुआ किसी से आगे चल कर मीत हो गये,
मीत प्रीति के आलिंगन में वर्षा ऋतु का गीत हो गया,
पत्थर-पत्थर नाम हमारा गढ़वाली संगीत हो गया,
किन्तु दीप को लौ देकर फिर बाती उसने नहीं बढ़ाई।
कैसी हवा चली उपवन में ... ....

राह तके जीवन भर जिनका वे क्षण मिले उधार हो गये,
देहरी से आँगन तक में ही सावन के घन क्वार हो गये,
जब-जब नीड़ बनाये हमनें झंझा को उपहार हो गये,
मेरे काँच खिलौनें मन पर ऐसे विषम प्रहार हो गये,
भोर हुई अपनें ही घर में किन्तु साँझ हो गई पराई।
कैसी हवा चली उपवन में ... ....

- अमित

Tuesday, March 3, 2009

गीत-प्रीति अगर अवसर देती तो

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प्रीति अगर अवसर देती तो हमनें भाग्य संवारा होता।
कमल दलों का मोह न करते आज प्रभात हमारा होता।

नीर क्षीर दोनों मिल बैठे बहुत कठिन पहचान हो गई,
किन्तु नीर नें नाम खो दिया और क्षीर की शान खो गई,
काश! कभी प्रेमी हृदयों को विधि नें दिया सहारा होता।
प्रीति अगर ... ...

सिन्धु मिलन के लिये नदी नें क्या-क्या बाधायें तोड़ी थीं,
जलधि अंक में मिल जानें की क्या-क्या आशायें जोड़ी थीं,
नदी सिन्धु से प्रीति न करती क्यों उसका जल खारा होता।
प्रीति अगर ... ...

अनजानें अनुबन्ध हो गये, होने लगे पराये अपनें,
श्यामाम्बर पर रजत कल्पना खींचा करती निशिदिन सपने,
मीत तुम्हें जाना ही था तो पहले किया इशारा होता।
प्रीति अगर ... ...

-अमित

Monday, March 2, 2009

ग़ज़ल

आशिक यहाँ जुल्फ-ओ-लब-ओ-रुख़्सार बहुत हैं।
पाने को इक झलक ही तलबगार बहुत हैं।


रेशम से भी नाजुक हैं तेरी जुल्फ के रेशे,
कहते हैं मगर इनमें गिरिफ़्तार बहुत हैं।


इतने फ़राख़-दिल तो नहीं लोग यहाँ के,
क्या बात है के उसके मददगार बहुत हैं।


अब दिल में बस गये हो सितम चाहे जो करो,
वरना तो परी-रुख़ सरे संसार बहुत हैं।


किस - किस का भरे जाम कि जब एक है साक़ी,
प्यासे लब-ओ-सागर लिये मैख़्वार बहुत हैं।


पतझड़ था और धूप थी, माली था अकेला,
अब खु़शबू-ए-चमन है तो हक़दार बहुत हैं।


चुपके से देखते हैं दिखावा नहीं करते,
मासूम न कह देना वो हुशियार बहुत हैं।


अब रुक गई है आ के कहानी तेरी हाँ पर,
अर्मान मेरे दिल में मेरे यार बहुत हैं।


जलवानुमा है हुस्न जो पाकीज़: करदे दिल,
यूँ तो गुदाज़ हुस्न के बाजार बहुत हैं।


-अमित (दिसम्बर,’९१)
जुल्फ-ओ-लब-ओ-रुख़्सार = केश और ओष्ठ और कपोल (गाल)। फ़राख़-दिल = विशाल हृदय। लब-ओ-सागर = ओष्ठ और मदिरापात्र।

Saturday, February 28, 2009

ग़ज़ल - याद का इक दिया सा जलता है।

याद का इक दिया सा जलता है।
लौ पकड़ने को दिल मचलता है।


ख़्वाब हो या कि हक़ीक़त दुनियाँ,
दम तो हर हाल में निकलता है।


वक़्त बेपीर है ये मान लिया,
आदमी ही कहाँ पिघलता है।


सरनिगूँ देख कर तुझे ऐ दोस्त,
मुझको अपना वजूद खलता है।


मौत के मुस्तकिल तकाजों में,
एक दिन और यूँ ही टलता है।


अर्श पर शम्स कमल कीचड़ में,
नासमझ देख करके खिलता है।


हमनें इस तरह निभाये रिस्ते,
जैसे कपडे़ कोई बदलता है।


कारवाँ जानें अब कहाँ पहुँचे,
हर कोई अपनी चाल चलता है।


उनके मतलब का रास्ता अक्सर,
मेरी मजबूरियों से मिलता है।


अपनी जिद छोड़ दू ’अमित’ लेकिन,
उनका तेवर कहाँ बदलता है।


- अमित


सरनिगूँ = सर झुका हुआ, लज्जित। मुस्तकिल = सतत। अर्श= आकाश। शम्स = सूर्य।

Wednesday, February 18, 2009

कभी - कभी










कभी - कभी जो नीति हमें चलना सिखलाती है।
कभी वही हमको इच्छित पथ से भटकाती है।

कभी - कभी मन का सूनापन अच्छा लगता है।
कभी - कभी सूनेपन से तबीयत घबराती है।

कभी - कभी हम भरी भीड़ मे रहे अकेले से,
कभी अकेले में यादों की भीड़ सताती है।

कभी - कभी मिलने की इच्छा पागल कर देती,
कभी - कभी मिल जाने पर तबीयत उकताती है।

कभी - कभी यूँ ही सोचा तत्काल हुआ करता,
कभी - कभी छोटी सी आशा उम्र बिताती है।

कभी - कभी हम ईश्वर के अत्यन्त कृतज्ञ हुये,
कभी - कभी उनके विवेक पर चिढ़ सी आती है।

कभी - कभी खुशियाँ ही मन को विचलित कर देतीं,
कभी - कभी मन की पीड़ा भी मन बहलाती है।

कभी - कभी वर्षों तक कोई गीत नहीं बनता।
कभी - कभी हर पंक्ति स्वयं कविता हो जाती है।

Saturday, February 7, 2009

चक्की

चक्की,
टनों गेहूँ चबानें के बाद भी,
मोटी नहीं होती,
बल्कि, घिस जाते हैं दाँत ही उसके।
मोटा होता है,
उसके पीसे पर जलन काटनें वाला
और भूँखों मरता है,
उसके दाँत सुधारने वाला।

-अमिताभ

Sunday, February 1, 2009

कविता का वह काल पुरुष, था जिसका नाम निराला।

गरल पिया जीवन भर जिसने, अमृत का रखवाला।
कविता का वह काल पुरुष, था जिसका नाम निराला ।

जीवन के झंझावतों से निशिदिन लड़ा अकेले,
सह कर देखे दुख कोई, जो महाप्राण ने झेले,
नहीं दीनता दिखलाई, था ऐसा साहस वाला।
कविता का वह काल पुरुष, था जिसका नाम निराला।

स्वर में स्वाभिमान का गर्जन, वाणी सरस्वती का नर्तन,
नई भंगिमा, नव अभिव्यंजन, छन्द-रुप-रस का परिवर्तन,
मत की परम्परा को जिसने तोड़ा वह मतवाला।
कविता का वह काल पुरुष, था जिसका नाम निराला।

रची भूमि जो उसने, उस पर फैला कुनबा सारा,
किन्तु किसी ने देखा क्या उस भिक्षुक को दोबारा,
कहाँ तोड़ती सड़क किनारे पत्थर अब वह बाला।
कविता का वह काल पुरुष, था जिसका नाम निराला।

अवसादों के क्षण में भी वह जन से कभी विरक्‍त नहीं था,
अपनी छवि की रक्षा के हित आत्ममुग्ध, अनुरक्‍त नहीं था,
था फक्कड़, जिसकी झोली में लाल करोड़ों वाला।
कविता का वह काल पुरुष, था जिसका नाम निराला।

तुलसी और राम दोनो के मन का कुशल चितेरा,
स्मृति में सरोज की जिसने अपना दर्द उकेरा,
क्षुद्र कुकुरमुत्‍ते को भी, सम्मान दिलाने वाला।
कविता का वह काल पुरुष, था जिसका नाम निराला।

करुणा करो दलित जन पर, माँगा था प्रभु से किसने,
बादल राग सुना कर हमको, मुग्ध किया था जिसने,
भिक्षुक है उदास, रोती है शिला कूटती बाला।
कविता का वह काल पुरुष, था जिसका नाम निराला।

Thursday, January 22, 2009

नई कविता - परम्परा का अनुकरण

परम्परा का अनुकरण


परम्परा का अनुकरण
या अनुकरण की परम्परा।
भीड़ चारों ओर
चिल्ल-पों और शोर।
भीड़, भीड़ों से घिरी,
भीड़, भीड़ों में गुथी,
भीड़ भी निरुपाय है,
भीड़ ही समुदाय है।
यन्‍त्र-चालित दौड़,
नहीं जिसमें,
स्वाँस का अवकाश।
लगी ऐसी होड़,
छिले घुटने,
ठोकरों ने तोड़ डाले,
पोर अँगुली के।
नाक से, मुँह से हुआ है,
रक्‍तपात।
किन्‍तु फिर भी,
दौड़ने को विवश।
भय है!
भीड़ से पीछे न रह जायें कहीं।
हम अकेले,
गुम न हो जायें कहीं।
अनुकरण की परम्परा
या परम्परा का अनुकरण।


--अमिताभ

Thursday, January 8, 2009

कुछ भूलें ऐसी हैं, जिनकी याद सुहानी लगती है।

कुछ भूलें ऐसी हैं, जिनकी याद सुहानी लगती है।
कुछ भूलें ऐसी जिनकी चर्चा बेमानी लगती है।

कुछ भू्लों के लिये शर्म भी आई हमको कभी-कभी,
कुछ भूलों की पृष्ठभूमि बिल्कुल शैतानी लगती है।

कुछ भूलों की विभीषिका से जीवन है अब तक संतप्त,
कुछ भूलों की सृष्टि विधाता की मनमानी लगती है।

कुछ भूलें चुपके से आकर चली गईं तब पता चला,
कुछ भूलों की आहट भी जानी पहचानी लगती है।

कुछ भूलों में आकर्षण था, कुछ भूलें कौतूहल थीं,
कुछ भूलों की दुनियाँ तो अब भी रुमानी लगती है।

कुछ भूलों का पछतावा है, कुछ में मेरा दोष नहीं,
कुछ भूलें क्यों हुईं, आज यह अकथ कहानी लगती है।

Wednesday, December 31, 2008

नव-वर्ष २००९ मंगलमय हो !!

समय की अन्तहीन सी डोर, न दिखता अगला पिछला छोर।
परिभ्रमण पृथ्वी का इक और, नई आशायें नई हिलोर ।
भूलकर असफलता अवसाद, विगत, अप्रिय विवाद- प्रतिवाद,
चलें हम नव विहान की ओर, वर्ष-नव मेघ, हुआ मन मोर।


(अमिताभ त्रिपाठी)

Thursday, December 18, 2008

जहाँ जाकर खत्म होती हैंदिशायें

जहाँ जाकर खत्म होती हैं दिशायें,
क्या वहाँ दीवार होगी?
क्या नहीं दीवार के उस पार भी होंगी दिशायें?
कल हुआ सूर्यास्त नभ के जिस निलय में,
शून्य का रक्‍ताभ आँचल है कहाँ?
ढूँढते हम जिसे उद्‍गम में विलय में,
सृष्टि का वह आदि कारण है कहाँ?
क्या निरर्थक प्रश्न सार्थक उत्तरों की खोज में,
पहुँच जाते समारोहों, गोष्ठियों में, भोज में?
हृदय कोई बन्‍द परिपथ
याकि तहखाना तिलिस्मी
एक भय अज्ञात सा मन में समाया।
नहीं खुलती ग्रंथि, बंद कपाट,
है उस पार क्या? कब जान पाया।
हम कलश की रुप संरचना, सजावट या कला के,
मुग्ध आलोचक, प्रशंसक या परीक्षक
नहीं कर पाते तनिक श्रम
झाँक कर देखें, कि,
इसके मध्य है क्या?

Monday, October 6, 2008

दोहा

बेटी है परदेश में, बेटा सागर पार।
बूढ़ी ऑंखें खोजतीं, अल्बम में परिवार।.