Friday, June 26, 2009

ग़ज़ल तरही - साफ इन्कार में ख़ातिर शिकनी होती है

इल्तिजा उसकी मुहब्बत में सनी होती है
साफ इन्कार में ख़ातिर शिकनी होती है

यूँ कमानी की तरह भौंह तनी होती है
नज़र पड़ते ही कहीं आगजनी होती है

अपना ही अक्स नज़र आती है अक्सर मुझको
वो हर इक चीज जो मिट्टी की बनी होती है

सौदा-ए-इश्क़ का दस्तूर यही है शायद
माल लुट जाये है तब आमदनी होती है

मैं पयाले को कई बार लबों तक लाया
क्या करूँ जाम की क़िस्मत से ठनी होती है

इतने अरमानो की गठरी लिये फिरते हो ’अमित’
उम्र इंसान की आख़िर कितनी होती है


- अमित

Wednesday, June 17, 2009

गीत - स्मृति के वे चिह्न


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स्मृति के वे चिह्न उभरते हैं, कुछ उजले कुछ धुंधले-धुंधले।
जीवन के बीते क्षण भी अब, कुछ लगते है बदले-बदले।

जीवन की तो अबाध गति है, है इसमें अर्द्धविराम कहाँ
हारा और थका निरीह जीव, ले सके तनिक विश्राम जहाँ
लगता है पूर्ण विराम किन्तु, शाश्वत गति है वो आत्मा की
ज्यों लहर उठी और शान्त हुई, हम आज चले कुछ चल निकले।
स्मृति के वे चिह्न उभरते हैं ... ...

छिपते भोरहरी तारे का, सन्ध्या में दीप सहारे का
फिर चित्र खींच लाया है मन, सरिता के शान्त किनारे का
थी मनश्क्षितिज में डूब रही, आवेगोत्पीड़ित उर नौका
मोहक आँखों का जाल लिये, आये जब तुम पहले-पहले।
स्मृति के वे चिह्न उभरते हैं ... ...

मन की अतृप्त इच्छाओं में, यौवन की अभिलाषाओं में
हम नीड़ बनाते फिरते थे, तारों में और उल्काओं में
फिर आँधी एक चली ऐसी, प्रासाद हृदय का छिन्न हुआ
अब उस अतीत के खँडहर में, फिरते हैं हम पगले-पगले।
स्मृति के वे चिह्न उभरते हैं ... ...


अमित

Sunday, June 14, 2009

गीत - जब जीवन की साँझ ढले

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जब जीवन की साँझ ढले तुम दीप जलाने आ जाना।
कुछ प्रभात कुछ दोपहरी की याद दिलाने आ जाना।

कंचन-कंचन घूम रहीं तुम मैं चन्दन-चन्दन फिरता
मैने तो संतोष कर लिया तुमको ठाँव नहीं मिलता
जब मृगतृष्णा का भ्रम टूटे प्यास बुझाने आ जाना
जब जीवन की साँझ ढले ... ... ...

चढ़ा हुआ सौन्दर्य तुम्हारा मेरी साँसें घुटी-घुटी
तुमने धरा छोड़ दी कब की चाल मेरी घिसटी-घिसटी
यौवन पवन शिथिल हो जाये मन बहलाने आ जाना
जब जीवन की साँझ ढले ... ... ...

लघु को विस्तृत कर देते जो कुछ प्रबुद्ध ऐसे भी हैं
रस पीकर अदृष्य हो जाते रसिक शुद्ध ऐसे भी हैं
जब मेरा मूल्यांकन कर लो अंक बताने आ जाना
जब जीवन की साँझ ढले ... ... ...


अमित (१९८४)

Friday, June 12, 2009

हे! अलक्षित।



व्याप्त हो तुम यों सृजन में
नीर जैसे ओस कन में
हे! अलक्षित।
तुम्हे
जीवन में, मरण में
शून्य में वातावरण में
पर्वतों में धूल कण में
विरह
में देखा रमण में
मनन
के एकान्त क्षण में
शोर
गुम्फित आवरण में
हे
! अनिर्मित।
तुम
कली की भंगिमा में
कोपलों
की अरुणिमा में
तारकों
में चन्द्रमा में
भीगती
रजनी अमा में
पुण्य
-सलिला अनुपमा में
ज्योत्स्ना
की मधुरिमा में
हे
! प्रकाशित।
गूढ़
संरचना तुम्हारी
तार्किक
की बुद्धि हारी
सभी
उपमायें विचारी
नेति
कहते शास्त्रधारी
बनूँ
किस छवि का पुजारी
मति
भ्रमित होती हमारी
हे
! अप्रस्तुत।
स्वयं
अपना भान दे दो
दृष्टि
का वरदान दे दो
रूप
का रसपान दे दो
नाद
स्वर का गान दे दो
और
अनुपम ध्यान दे दो
मुझे
शाश्वत ज्ञान दे दो
हे
! अयुग्मित।


अमित

Tuesday, June 2, 2009

ग़ज़ल - जो कुछ हो सुनाना उसे बेशक़ सुनाइये


जो कुछ हो सुनाना उसे बेशक़ सुनाइये
तकरीर ही करनी हो कहीं और जाइये

याँ महफ़िले-सुखन को सुखनवर की है तलाश
गर शौक आपको भी है तशरीफ़ लाइये।

फूलों की जिन्दगी तो फ़क़त चार दिन की है
काँटे चलेंगे साथ इन्हे आजमाइये।

क‍उओं की गवाही पे हुई हंस को फाँसी
जम्हूरियत है मुल्क में ताली बजाइये।

रुतबे को उनके देख के कुछ सीखिये 'अमित'
सच का रिवाज ख़त्म है अब मान जाइये।

-- अमित

Thursday, May 28, 2009

ग़ज़ल - माननीय अत्यन्त हो गए

जिसने आगे बढ़ कर छीना वे सज्जन श्रीमन्त हो गये
और पंक्ति में खड़े-खडे़ हम अक्षरहीन हलन्त हो गये

इतने भोले नहीं कि दुनिया छले और हम पता न पायें
उदासीन हो गये जो देखा घने लुटेरे संत हो गये

जब मादक संगीत खनकते सिक्कों का पड़ गया सुनाई
सभी इन्द्रियाँ जगी अचानक सभी अंग जीवन्त हो गये (१९९२)

जिनकी महिमा संरक्षित है कितने थानो के ग्रन्थों में
लोकतन्त्र का सूत्र पकड़कर माननीय अत्यन्त हो गये

जब भी संकट पड़ा राष्ट्र पर आई बलिदानो की बारी
चोर-रास्ता पकड़ भागने को तैय्यार तुरन्त हो गये



अमित (२७/०५/०९)

Tuesday, May 19, 2009

ग़ज़ल - किसी को घर नहीं देता

किसी को महल देता है किसी को घर नहीं देता
विधाता! इन सवालों का कोई उत्तर नहीं देता

जिन्हे निद्रा नहीं आती पडे़ हैं नर्म गद्दों पर
जो थक चूर हैं श्रम से उन्हे बिस्तर नहीं देता

ये कैसा कर्म जिसका पीढ़ियाँ भुगतान करती हैं
ये क्या मज़हब है जो सबको सही अवसर नहीं देता

तुम्हारी सृष्टि के कितने सुमन भूखे औऽ प्यासे हैं
दयानिधि! इनके प्यालों को कभी क्यों भर नहीं देता

मुझे विश्वास पूरा है, तेरी ताकत औऽ हस्ती पर
तू क्यों इक बार सबको इक बराबर कर नहीं देता


अमित (१९/०५/०९)

Sunday, May 17, 2009

नवगीत - वेदना

बीती जाय जवानी रे
बीती जाय जवानी (दो बार)

गई कपोलों की चिकनाई
पडी़ आँख के नीचे छाई
नई लकीरें उभर रही हैं
सलवट हुई पेशानी रे
बाती जाय जवानी

जुगराफ़िया हो गया ढीला
मध्य भाग में उभरा टीला
जकड़ गई है कमर, पीठ भी
झुक कर हुई कमानी रे
बाती जाय जवानी

खत्म हुई चालों की चुस्ती
छाई रहती अक्सर सुस्ती
यादें ही हैं शेष कि अब तो
मस्ती! हुई कहानी रे
बाती जाय जवानी

अंकल कह कर गई यौवना
उठी हृदय में तीव्र वेदना
तभी याद आ गया अचानक
बिटिया हुई सयानी रे
बाती जाय जवानी

एकालाप सुना जब उसने
कहा देखते हो क्यों सपने
बीत गई, फिर भी कहते हो
बीती जाय जवानी रे
बाती जाय जवानी


अमित (१७/०५/०९)
जुगराफ़िया = भूगोल, पेशानी = मस्तक

Monday, May 11, 2009

मुक्तक - प्रकीर्ण

है उड़ानों में चपलता और दाना चोंच में। पड़ गई है देख कर चिड़िया मुझे संकोच में। घोसले के पास तक उड़ती है पर घुसती नहीं, मैं न उसका आसियाना देख लूँ इस सोच में। अपनी ताकत आजमाना चाहता है। दूसरों को भी दिखाना चाहता है। मैं किसी मंदिर का घंटा हो गया हूँ, हर कोई जिसको बजाना चाहता है। जीवन की स्थितियों के ही अनुकूल गये। इतना सा है याद, बहुत कुछ भूल गये। मैं बापू के साथ मजूरी पर निकला, वो अपना बस्ता लेकर स्कूल गये। हालिया साँचों बिल्कुल फिट नहीं हूँ। दोस्तों की महफिलों में हिट नहीं हूँ। रंग मुझको भी बदलना चाहिये कुछ, आदमी हूँ क्या करूँ गिरगिट नहीं हूँ। आइये कुछ दूर चलिये जिन्दगी के साथ में। चीथड़ों का इक मुहल्ला उगा है फुटपाथ में। गन्दगी में बिलबिलाते मर्द, बच्चे, औरतें, प्लास्टिक का इक तिरंगा भी है उनके हाथ में। अमित

Friday, May 8, 2009

ग़ज़ल - बहुत गुमनामों में शामिल एक नाम अपना भी है

बहुत गुमनामों में शामिल एक नाम अपना भी है
इल्मे-नाकामी में हासिल इक मक़ाम अपना भी है

गौर करने के लिये भी कुछ न कुछ मिल जायेगा
हाले-दिल पर हक़ के बातिल इक कलाम अपना भी है

मेहरबाँ भी हैं बहुत और कद्रदाँ भी हैं बहुत
हो कभी ज़र्रानवाज़ी इन्तेजाम अपना भी है

कब हुज़ूरे-वक़्त को फ़ुरसत मिलेगी देखिये
मुश्त-ए-दरबान तक पहुँचा सलाम अपना भी है

चलिये मैं भी साथ चलता हूँ सफ़र कट जायेगा
आप की तक़रीर के पहले पयाम अपना भी है

इक परिन्दे की तरह बस आबो-दाने की तलाश
जिन्दगी का यह तरीका सुबहो-शाम अपना भी है

घर की चौखट तक मेरा ही हुक़्म चलता है ’अमित’
मिल्कीयत छोटी सही लेकिन निज़ाम अपना भी है


अमित
इल्मे-नाकामी = असफलता की विद्या, मक़ाम = स्थान, हक़ के बातिल = सच या झूठ, कलाम = वाणी या वचन, मेहरबाँ = दयालु, क़द्रदाँ = गुणग्राहक, ज़र्रानवाज़ी = दीनदयालुता, मुश्त-ए-दरबान = दरबान की मुट्ठी, तक़रीर = भाषण या उपदेश, पयाम = संदेश, आबो-दाना = अन्न-जल, मिल्कीयत = जायेदाद, निज़ाम = शासनव्यवस्था या प्रबन्धतन्त्र ।

Wednesday, May 6, 2009

ग़ज़ल - बतर्ज-ए-मीर

अक्सर ही उपदेश करे है, जाने क्या - क्या बोले है।
पहले ’अमित’ को देखा होता अब तो बहुत मुहँ खोले है।

वो बेफ़िक्री, वो अलमस्ती, गुजरे दिन के किस्से हैं,
बाजारों की रक़्क़ासा, अब सबकी जेब टटोले है।

जम्हूरी निज़ाम दुनियाँ में इन्क़िलाब लाया लेकिन,
ये डाकू को और फ़कीर को एक तराजू तोले है।

उसका मक़तब, उसका ईमाँ, उसका मज़हब कोई नहीं,
जो भी प्रेम की भाषा बोले, साथ उसी के हो ले है।

बियाबान सी लगती दुनिया हर रौनक काग़ज़ का फूल
कोलाहल की इस नगरी में चैन कहाँ जो सो ले है


अमित (06/05/09)

Monday, May 4, 2009

ग़ज़ल - अपनी - अपनी सलीब ढोता है

अपनी - अपनी सलीब ढोता है
आदमी कब किसी का होता है

है ख़ुदाई-निज़ाम दुनियाँ का
काटता है वही जो बोता है

जाने वाले सुकून से होंगे
क्यों नयन व्यर्थ में भिगोता है

खेल दिलचस्प औ तिलिस्मी है
कोई हँसता है कोई रोता है

सब यहीं छोड़ के जाने वाला
झूठ पाता है झूठ खोता है

मैं भी तूफाँ का हौसला देखूँ
वो डुबो ले अगर डुबोता है

हुआ जबसे मुरीदे-यार ’अमित’
रात जगता है दिन में सोता है

अमित(३०-०४-०९)