Friday, December 4, 2009

नज़्म - आइये इक पहर यहीं बैठें


आइये इक पहर यहीं बैठें
साथ सूरज के ढलें सुरमई अंधेरों में
सुने बेचैन परिन्दों की चहक
लौट कर आते हुये फिर उन्ही बसेरों में

आशियाँ सबको हसीं लगता है अपना, लेकिन
बस मुकद्‌दर में सभी के मकाँ नहीं होता
और हैरत है कि मस्रूफ़ियाते-दीगर में
इस कमी का मुझे कोई गुमाँ नहीं होता

उम्र कटती ही चली जाती है
इन दरख़्तों के तले, बेंच पे, फुटपाथों पर
कितने ही पेट टिके हैं देखें
दौड़ती पैर की जोड़ी पे और हाथों पर

रोज़ सूरज को जगाता हूँ सवेरे उठकर
रात तारों के दिये ढूँढ कर जलाता हूँ
वक़्ते-रुख़्सत की वो आँखें उभर सी आती हैं
जाने कितने ही ख़यालों में डूब जाता हूँ

ज़िन्दगी छोटी है, तवील भी है
मस‍अला भी है, इक दलील भी है
छोड़िये ये फ़िज़ूल की बहसें
आइये इक पहर यहीं बैठें


अमित
शब्दार्थ:
मसरूफ़ियाते-दीगर = अन्य व्यस्तताओं में
वक़्ते-रुख़्सत = विदा के समय
तवील = लम्बी
मस‍अला = समस्या
दलील = युक्ति


--
रचनाधर्मिता (http://amitabhald.blogspot.com/)
M

Saturday, November 14, 2009

ग़ज़ल - मुझको इंकार आ गया शायद

एक पुरानी ग़ज़ल

उनको अब प्यार आ गया शायद
मुझको इंकार आ गया शायद

एक बेचैन सी ख़मोशी है
बक्ते-बीमार आ गया शायद

कुछ चहल-पलह है ख़ाकी-ख़ाकी
कोई त्योहार आ गया शायद

होश गु़म और लुटे-लुटे चेहरे
कोई बाज़ार आ गया शायद

खून की बू सी अभी आई है
अपना अख़बार आ गया शायद


अमित (१९९४)
Mob:

Wednesday, November 11, 2009

कुछ सामयिक दोहे

युद्ध रोकने के लिये, युद्ध हुआ अनिवार्य।
वीर भोगते हैं धरा, क्यों सोये हो  आर्य॥

जन की, धन की, देश की, करे सुरक्षा कौन।
निर्णायक  संवाद में, रह  जाते  हो मौन॥

विषधर को शोभे क्षमा, कवि कह गया प्रवीन।
दन्तहीन, विषहीन  पर, शासन  करती बीन॥

जब अपना  घर हो  भरा, सब देते  सहयोग।
मरुथल प्यासा ही रहे, जलनिधि को जलयोग॥


प्रभाष जोशी जी के निधन पर

निविड़ कालिमा छा गयी, ज्यों भादौं की रात।
सुख का घट रीता हुआ, दुख की भरी  परात॥


अमित


Mob:

Sunday, November 1, 2009

नवगीत - चलो लौटें कविता की ओर


छोड़ कर,
व्यस्त क्रमों की डोर
चलो लौटें कविता की ओर

कसमसाहट है मन बेचैन
चतुर्दिक विम्ब खोजते नैन
बुलाये देकर कोई सैन
सुनाये स्नेहसिक्त कुछ बैन
मौन हो सुनूँ स्वास के छंद
भूलकर जग में बिखरा शोर
चलो लौटें कविता की ओर

हुआ क्या अब तक व्यर्थ व्यतीत
अर्थ संचय में लगा अतीत
देह के सुविधाओं की जीत
मन कहीं और कहीं मनमीत
अरे! किसके हित किया प्रबन्ध
हृदय है या पाषाण कठोर?
चलो लौटें कविता की ओर

नियति के कुछ अलिखित अध्याय
स्वयं लिख दें यदि करें उपाय
हृदय का वह कपाट खुल जाय
जहाँ सोई कविता निरुपाय
सृष्टि-क्रम का आदिम आनंद
क्षितिज-घूँघट सरकाती भोर
चलो लौटें कैविता की ओर

अमित

Mob:

Tuesday, October 6, 2009

नवगीत - रिश्तों का व्याकरण


(यह नवगीत, नवगीत की पाठशाला के लिए लिखा था| 
इसे आप अनुभूति में भी देख सकते हैं|)


अनुकरण की
होड़ में अन्तःकरण चिकना घड़ा है
और रिश्तों का पुराना व्याकरण
बिखरा पड़ा है।
 

दब गया है
कैरियर के बोझ से मासूम बचपन
अर्थ-वैभव हो गया है सफलता का सहज मापन
सफलता के
शीर्ष पर जिसके पदों का हुआ वन्दन
देखिये किस-किस की गर्दन को
दबा कर वो खड़ा है।
और रिश्तों का पुराना व्याकरण
बिखरा पड़ा है।

सीरियल के
नाटकों में समय अनुबंधित हुआ है
परिजनो से वार्ता-परिहास क्रम
खंडित हुआ है
है कुटिल
तलवार अंतर्जाल का माया जगत भी
प्रगति है यह या कि फिर विध्वंस
का खतरा बड़ा है।
और रिश्तों का पुराना व्याकरण
बिखरा पड़ा है।

नग्नता
नवसंस्कृति की भूमि में पहला चरण है
व्यक्तिगत स्वच्छ्न्दता ही प्रगतिधर्मी
आचरण है
नई संस्कृति के नये
अवदान भी दिखने लगे अब
आदमी अपनी हवस की दलदलों
में जा गड़ा है
और रिश्तों का पुराना व्याकरण
बिखरा पड़ा है।

--अमित

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Sunday, October 4, 2009

ग़ज़ल - यूँ चम्पई रंगत प सिंदूरी निखार है

एक रवायती (पारंपरिक) ग़ज़ल प्रस्तुत है|


यूँ चम्पई रंगत प सिंदूरी निखार है
इंसानी पैरहन में गुले-हरसिंगार है।

धानी से दुपट्टे में बसंती सी हलचलें
मौज़े-ख़िरामे-हुस्न कि फ़स्ले-बहार है।

गुजरा है कारवाने-क़ायनात इधर से
ये कहकशाँ की धुन्ध भी मिस्ले-गुबार है।

जिस पर भी पड़ गयी है निगहे-नाज़े-सरसरी
इंसाँ नियाजे-हुस्न का उम्मीदवार है।

आतिश जले कहीं भी पहुँचते हैं फ़ित्रतन
दीवानगी का अहद भी परवानावार है।

क्यूँ हुस्न प लगती रही पाक़ीज़गी की शर्त
पूछा कभी कि इश्क़ भी परहेजगार है।

इतने क़रीब से भी न गुजरे कोई 'अमित'
गो आग बुझ भी जाय प रहता शरार है।


अमित
शब्दार्थ:
पैरहन = वस्त्र, मौज़े-ख़िरामे-हुस्न = सौन्दर्य के चाल की तरंग, फ़स्ले-बहार= बसन्त
निगहे-नाज़े-सरसरी = मान से उक्त सरसरी निगाह,कहकशाँ= आकाश गंगा, मिस्लेगुबार = गुबार की तरह
नियाजे-हुस्न = हुस्न की कृपा, फ़ित्रतन = स्वाभाविक रूप से, अहद = प्रतिज्ञा, परवानावार = परवानो की तरह
पाक़ीज़गी = पवित्रता, परहेजगार= संयमी, शरार = चिंगारी।

Tuesday, September 22, 2009

ग़ज़ल - हम अपने हक़ से जियादा नज़र नहीं रखते

हम अपने हक़ से जियादा नज़र नहीं रखते
चिराग़ रखते हैं, शम्सो-क़मर नहीं रखते।

हमने रूहों पे जो दौलत की जकड़ देखी है
डर के मारे ये बला अपने घर नहीं रखते।

है नहीं कुछ भी प ग़ैरत प आँच आये तो
सबने देखा है के कोई कसर नहीं रखते।

इल्म रखते हैं कि इंसान को पहचान सकें
उनकी जेबों को भी नापें, हुनर नहीं रखते।

बराहे-रास्त बताते हैं इरादा अपना
मीठे लफ़्जों में छुपा कर ज़हर नहीं रखते।

हम पहर-पहर बिताते हैं ज़िन्दगी अपनी
अगली पीढ़ी के लिये मालो-ज़र नहीं रखते।

दिल में आये जो उसे कर गुज़रते हैं अक्सर
फ़िज़ूल बातों के अगरो-मगर नहीं रखते।

गो कि आकाश में उड़ते हैं परिंदे लेकिन
वो भी ताउम्र हवा में बसर नहीं रखते।

अपने कन्धों पे ही ढोते हैं ज़िन्दगी अपनी
किसी के शाने पे घबरा के सर नहीं रखते।

कुछ ज़रूरी गुनाह होते हैं हमसे भी कभी
पर उसे शर्म से हम ढाँक कर नहीं रखते।

हर पड़ोसी की ख़बर रखते हैं कोशिश करके
रूसो-अमरीका की कोई ख़बर नहीं रखते।

हाँ ख़ुदा रखते हैं, करते हैं बन्दगी पैहम
मकीने-दिल के लिये और घर नहीं रखते।

घर फ़िराक़ और निराला का, है अक़बर का दियार
'अमित' के शेर क्या कोई असर नहीं रखते।


- अमित

शब्दार्थः
शम्सो-क़मर = सूरज और चन्द्रमा, बराहे-रास्त = सीधे - सीधे, शाने = कन्धे, पैहम = लगातार, मकीने-दिल = दिल का निवासी।

Wednesday, September 16, 2009

गीत - तुम मुझको उद्दीपन दे दो ...

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तुम मुझको उद्दीपन दे दो गीतों का उपवन दे दूँगा
थोड़ा सा अपनापन दे दो मैं सारा जीवन दे दूँगा।

मेरा तुमको कुछ दे देना जगप्रचिलित व्यापार नहीं है
और अपेक्षा रखना तुमसे बदले का व्यवहार नहीं है
जैसे यदि आराधन देदो श्रद्धासिक्त सुमन दे दूँगा।
तुम मुझको उद्दीपन दे दो ... ... ...

दुस्साहस भी कर सकता हूँ यदि तुम सम्बल देती जाओ
श्रम-सीकर से भय ही कैसा बस तुम आँचल झलती जाओ
सच कह दूँ संकेत मात्र पर तारों भरा गगन दे दूँगा।
तुम मुझको उद्दीपन दे दो ... ... ...

कमल कपूर भाँति उर मेरा कोमल और अग्नि शंकित है
जिस पर काला सा अतीत और धुंधला सा भविष्य अंकित है
यदि इसका अभिसार कर सको युग-प्रवाह नूतन दे दूँगा।
तुम मुझको उद्दीपन दे दो ... ... ...

-अमित
(१९८५-८६)
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मेरी रचनाये (http://amitabhald.blogspot.com)

Saturday, September 5, 2009

दस हाइकु

()
अप्रासंगिक
पुरानी परिपाटी
जीवन साथी

()
पीढ़ी-अन्तर
मैकडॉनल पिज़्ज़ा
चुपड़ी रोटी

()
अपराधी हैं?
सुरक्षित विहार
ये कारागार

()
धोबी की हत्या
घर का मालिक है
धोबी का कुत्ता

()
एक शिकारी
दफ़्तर सरकारी
किसकी बारी?

()
राष्ट्रीय पक्षी
देखो! राष्ट्रीय पशु
क्या है आदमी?

()
पुलिस आई
कुत्तों ने जेबें सूँघी
पुलिस गई

()
चैनल सन्त
चमत्कार अनन्त
दुखी का अन्त

()
गुरू घन्टाल
छन रहा है माल
चेला बेहाल

(१०)
खोमचेवाला
लगी है टकटकी
गर्ल्स हॉस्टल

Tuesday, September 1, 2009

कविता - वास्तविकता

ड्राइंग रूम में अपना एक चित्र लगाया है
जो मुझे आकर्षक दिखाता है
पर मेरे जैसा नहीं दिखता
एक तख्ती दरवाजे पर
उपाधियां दर्शाती है, मेरी
जिन्हें मैं जानता हूँ कि कागजी हैं
और ओढे रहता हूँ एक गंभीरता
कि लोग बहुत नजदीक न आ जाँय
जान लें मेरी वास्तविकता
लेकिन कभी-कभी सोचता हूँ
कि देंखूं
इन सबके बिना
मैं कैसा लगता हूँ|

Saturday, August 15, 2009

हिन्दी ग़ज़ल - अच्छाई से डर लगता है।

सबको तुम अच्छा कहते हो, कानो को प्रियकर लगता है
अच्छे हो तुम किन्तु तुम्हारी अच्छाई से डर लगता है।

सुन्दर स्निग्ध सुनहरे मुख पर पाटल से अधरों के नीचे
वह काला सा बिन्दु काम का जैसे हस्ताक्षर लगता है।

स्थितियाँ परिभाषित करती हैं मानव के सारे गुण-अवगुण
मकर राशि का मन्द सूर्य ही वृष में बहुत प्रखर लगता है।

ज्ञानी विज्ञानी महान विद्वज्जन जिसमें कवि अनुरागी
वाणी के उस राजमहल में कभी-कभी अवसर लगता है।

विरह-तप्त व्याकुल अन्तर को जब हो प्रियतम-मिलन-प्रतीक्षा,
हर कम्पन सन्देश प्रेम का हर पतंग मधुकर लगता है।

अमित

Tuesday, August 4, 2009

नवगीत - सुख-दुख आना-जाना।

सुख-दुख आना-जाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।

सुख की है कल्पना पुरानी
स्वर्गलोक की कथा कहानी
सत्य-झूठ कुछ भी हो लेकिन
है मन को भरमाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।

सुख के साधन बहुत जुटाये
सुख को किन्तु खरीद न पाये
थैली लेकर फिरे ढूँढते
सुख किस हाट बिकाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।

आस-डोर से बँधी सवारी
सुख-दुख खीचें बारी-बारी
कहे कबीरा दो पाटन में
सारा जगत पिसाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।

वनवासी जीवन में सुख था
शशिमुख के आगे रवि मुख था
किन्तु स्वर्ण-मृग की इच्छा में
लंका हुआ ठिकाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।

दुखमय जगत काल की फाँसी
देख कुमार हुआ सन्यासी
शोध किया तो पाया तृष्णा-
पीछे जग बौराना साथी
सुख-दुख आना-जाना।

जब-जब किया सुखों का लेखा
सुख को पता बदलते देखा
किन्तु सदा ही इसके पीछे
दुख पाया लिपटाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।

जीवन की अनुभूति इसी में
द्वेष इसी में प्रीति इसी में
इसी खाद-पानी पर पलकर
जीवन कुसुम फुलाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।