Thursday, May 28, 2015

नवगीत - किसका बाट जोहती है तू नैया री!


किसका बाट जोहती है तू
नैया री!

जिनको तूने पार उतारा
कोई तेरा हुआ सहारा
सबने दाम दिये नाविक को
तुझे पैर से धक्का मारा
सब चुप चाप सहा करती है
कभी न कहती दैया री

केवट ने सुख लूटा सारा
स्वयं तरा पुरखों को तारा
प्रभु तेरी गोदी में बैठे
धन्यवाद क्या किया तुम्हारा
तुझे मुसाफ़िर भी ठगते है
ठगता रोज़ खिवैया री

लहरों की ठोकर सहती है
घावों से रिसती रहती है
सबको पार लगा देने को
गर्दन तक डूबी बहती है
तूने डगमग किया तनिक तो
याद आ गई मैया री

सब तेरे ऊपर तिरते हैं
मरने से कितना डरते हैं
वैतरणी में डूब न जायें
सो गोदान किया करते हैं
तू जो निश-दिन पार उतारे
कभी न कहते गैया री

किसका बाट जोहती है तू
नैया री!


- अमित

Monday, August 4, 2014

नवगीत - मित्रो आज टमाटर खाया।


मित्रो! आज टमाटर खाया
भावातीत परमसुख पाया

बीस रूपये किलो बिक रहा
थी दुकान पर मारा-मारी
दैहिक, वाचिक संघर्षों के
बाद लगी मेरी भी बारी
एक शतक का नोट बढ़ाकर
झोले का श्रीमुख फैलाया

"बीस रूपये खुल्ले देना
एक किलो आडर सरकारी"
टूट गया झोले का भी मन
चेहरे पर छाई लाचारी
बटुआ, झोला, वस्त्र बचाते
एक किलो ले बाहर आया

हुआ मुहल्ले में जब दाखिल
दस गज सीना फुला हुआ था
चार इंच मुस्कान सजी थी
मुख गुलाब सा खिला हुआ था
बढ़ा-चढ़ा कर शौर्य-कथा को
घर पर अपना रोब जमाया

चटनी बनी, सलाद कट गया
सिद्ध टमाटर से तरकारी
चटकारे ले जीम रहा था
इन सबको मैं बारी-बारी
परमतृप्ति के इन्हीं क्षणों में
कानों से कटु स्वर टकराया

उठ भी जाओ! 
दिन चढ़ आया।

मित्रो! ख़ूब टमाटर खाया!

-अमित

Friday, March 14, 2014

गुरु-वन्दना




गुरु तुम सम न कोई उपकारी
द्वार तुम्हारे आकर पाई
मैंनें सम्पति सारी
गुरु तुम बिन न कोई उपकारी

बुद्दि-विवेक विहीन फिरा मैं
तृष्णा से सब ओर घिरा मैं
हे करुणामय! तृप्त हुआ मैं
पाकर कृपा तुम्हारी
गुरु तुम बिन न कोई उपकारी

घोर निशा में दिशाहीन से
जल से बिछुड़ी हुई मीन से
भय-व्याकुल मन को चरणों की
धूलि हुई भयहारी
गुरु तुम बिन न कोई उपकारी

जब हो आर्त्त पुकारा मैंनें
पाया सदा सहारा मैंनें
श्रेय दिया प्रभु तुमनें मुझको
प्रेय दिया हितकारी
गुरु तुम बिन न कोई उपकारी

-अमित

Monday, October 7, 2013

नवगीत - कहते रहो कहानी बीर



कहते रहो कहानी बीर
अपनी आँधी-पानी बीर
तुम पहरे पर खड़े रहे
डूब गई रजधानी बीर

सारे चारण और कहार
बोल रहे हैं जै जै कार
महरानी ने ठोंकी पीठ
डटे रहे तुम राज कुमार
हैं दीवान सयाने जी
परखे और पहचाने जी
लेकिन इनकी उमर हुई
अब ख़ुद लो निगरानी बीर

सवा अरब से ज़्यादा भाल
इन्द्रप्रस्थ में किन्तु अकाल
गुदड़ी ही गुदड़ी निकली
स्याह पड़ गये सारे लाल
सबकी मिलीभगत लगती
अन्दर ही खिचड़ी पकती
दिखलाने को जनता में
नूरा कुश्ती ठानी बीर

जैसे ऊँट सवारी बीर
है खेती सरकारी बीर
नीलगाय ने कल चर ली
अब टिड्डों की बारी बीर
चाहे देश हुआ कंगाल
देशी-सेवक मालामाल
गन्ने पर कब्ज़ा जिसका
उसकी ही गुड़धानी बीर

-अमित

Tuesday, August 13, 2013

ग़ज़ल - दर्द ऐसा, बयाँ नहीं होता


दर्द ऐसा, बयाँ नहीं होता
जल रहा हूँ, धुआँ नहीं होता

अपने अख़्लाक़ सलामत रखिये
वैसे झगड़ा कहाँ नहीं होता

आसमानों से दोस्ती कर लो
फिर कोई आशियाँ नहीं होता

इश्क़ का दौर हम पे दौराँ था
ख़ुद को लेकिन ग़ुमाँ नहीं होता

कोई सब कुछ भुला दे मेरे लिये
ये तसव्वुर जवाँ नहीं होता

जब तलक वो क़रीब रहता है
कोई शिकवा ज़ुबाँ नहीं होता

पाँव से जब ज़मीं खिसकती है
हाथ में आसमाँ नहीं होता

-अमित

Thursday, July 11, 2013

इन्हीं मेघों से...



इन्ही मेंघों से निकलकर
चंचला की श्रृंखलायें
सुपथ आलोकित करेंगी
इन्हीं मेघों से झरेंगी
सुधा की रसमयी बूँदे
पुनः नवजीवन भरेंगी



इन्हीं मेघों से फिसलकर
रश्मियाँ नक्षत्रपति की
इन्द्रधनु मोहक रचेंगी
इन्ही मेंघों से हुआ प्रेरित
पवन, सन्देश देगा
नेह की नदियाँ बहेंगी



इन्हीं मेघों से धुलेंगे
सभी कच्चे रंग, पक्के
रंग की निधियाँ बचेंगी
इन्हीं मेघों से हुआ
भयभीत क्यों मन
अरे! ऋतु के चक्र का है 
यही सावन





छँटेंगे जब मेघ
होगी पूर्णिमा
फिर से शरद की।





-अमित
चित्र:  १ एवं ३ स्वयं तथा २ एवं ४ गूगल से साभार।

Sunday, July 7, 2013

गीत- निद्रित नहीं उनींदा सा हूँ


निद्रित  नहीं उनींदा सा हूँ
स्नात नहीं पर भीगा सा हूँ

जग की विषम व्यथायें कितनी
निज की पीर-कथायें कितनी
उलझी मनोदशा से अपनी
त्रस्त नहीं पर खीझा सा हूँ

यह विस्तृत आयोजन क्या है
मेरा यहाँ प्रयोजन क्या है
जीवन एक समस्या अनगिन
अशक्यता में तीखा सा हूँ।

विडम्बनाओं की है गठरी
यंत्र-प्रचालित लगती ठठरी
व्यर्थ क्रियाओं के संकुल में
नट-क्रीड़ा को जीता सा हूँ।

क्या कर लूँ, क्या हो जाऊँ मैं?
तुष्ट सभी को कर पाऊँ मैं
पँसगें मैं जीवन है अपना
वक्र जगत में सीधा सा हूँ।

आशाओं का पुनर्वास कर
घोर अंधेरे में प्रयास कर
बढ़ता हूँ टटोल कर पथ को
मन्द नहीं पर फीका सा हूँ।

-अमित

शब्दार्थ: स्नात - नहाया हुआ, पासंग - तुला को सन्तुलित करने वाला भार
चित्र: 123RF.com से साभार द्वारा गूगल।

Tuesday, April 16, 2013

होली पर धनाक्षरियाँ

दो घनाक्षरियाँ होली पर ( होली २०१३ में लिखी गई)

भंग की तरंग में अनंगनाथ झूम रहे, 
फागुनी बयार से जटा भी छितराई है।
गंग की तरंग भी उमंग में कुरंगिनी सी,
शैलजेश की जटाटवी को छोड़ धाई है।
थाप पे मृदंग की नटेश नृत्यमान हुये
दुंदुभी रतीश ने भी जोर से बजाई है।
रुद्र के निवास में वसन्त मूर्तिमान हुआ,
गा रहा बधाई होरी आई, होरी आई है।

साँस में पराग की सुगंध सी समाई हुई,
आँख में पलाश के हुलास की ललाई है।
सैन-सैन बात करे बैन-बैन घात करे,
चाल चपला सी भंगिमा में तरुनाई है।
रंग में नहा चुकी है बार कितनी ही किन्तु,
होड़ में सभी के लगे जैसे पगलाई है।
देख के किसी की ओर नैन हुये कोर-कोर,
गाल के गुलाल ने कहा कि होली आई है।


--अमित

Monday, December 17, 2012

ग़ज़ल- ख़्वाब ही था ज़िन्दगी कितनी सहल हो जायेगी



ख़्वाब ही था ज़िन्दगी कितनी सहल हो जायेगी
तुम जो गाओगे रुबाई भी ग़ज़ल हो जायेगी

इतने आईनों से गुज़रे हैं यक़ीं होता नहीं
अज़नबी सी एकदिन अपनी शकल हो जायेगी

मर्हले ऐसे भी आयेंगे नहीं मालूम था
उम्र भर की होशियारी बेअमल हो जायेगी

है बहुत मा’कूल फिर भी शक़ है मौसम पर मुझे
तज्रबा है अन्त में ग़ारत फ़सल हो जायेगी

साँस की क़श्ती ख़ुद अपना बोझ सह पाती नहीं
कोई दिन होगा कि हस्ती बेदखल हो जायेगी

- अमित

Tuesday, December 11, 2012

ग़ज़ल - दिल मुसाफ़िर ही रहा सूये-सफ़र आज भी है



दिल मुसाफ़िर ही रहा सूये-सफ़र आज भी है
हाँ! तसव्वुर में मगर पुख़्ता सा घर आज भी है

कितने ख्वाबों की बुनावट थी धनुक सी फैली
कूये-माज़ी में धड़कता वो शहर आज भी है

बाद मुद्दत के मिले, फिर भी अदावत न गयी
लफ़्जे-शीरीं में वो पोशीदा ज़हर आज भी है

नाम हमने  जो अँगूठी से लिखे थे मिलकर
ग़ुम गये हैं मगर ज़िन्दा वो शज़र आज भी है

अब मैं मासूम शिकायात पे हँसता तो नहीं
पर वो गुस्से भरी नज़रों का कहर आज भी है

-अमित

शब्दार्थ: सूये-सफ़र - यात्रा की ओर, तसव्वुर - कल्पना, कूये-माज़ी - अतीत की गली, लफ़्जे-शीरीं - भीठे शब्द, पोशीदा - छिपाहुआ 
चित्र - गूगल से साभार।

Friday, December 7, 2012

हास्य ग़ज़ल - शहर मुझको तेरे सारे मुहल्ले याद आते हैं।



शहर मुझको तेरे सारे मुहल्ले याद आ्ते हैं
दुकाँ पर चाय की बैठे निठल्ले याद आते हैं

म्यूनिसपैलिटी के बेरोशन चराग़ों की कसम मुझको
उठाईगीर जेबकतरे चिबिल्ले याद आते हैं

तबेलों और पिगरी फार्म का अधिकार पार्कों पर
खुजाती तन मिसेज डॉग्गी औऽ पिल्ले याद आते हैं

मैं हाथी पार्क के हाथी पे रख कर हाथ कहता हूँ
नवोदित प्रेम के कितने ही छल्ले याद आते हैं

वो इन्वर्टर का अन्तिम साँस लेकर बन्द हो जाना
जब आई रात में बिजली तो हल्ले याद आते हैं

सड़क के उत्खनन को भूल से यदि भूल भी जाऊँ 
तो टूटे दाँत और माथे के गुल्ले याद आते हैं

गुज़रता है कभी जब काफ़िला नव-कर्णधारों का
मुझे सर्कस के जोकर से पुछल्ले याद आते हैं

सिविल लाइन्स में है मॉल-ओ-मल्टीप्लेक्स की दुनियाँ
के दिन ढलते खिलीबाँछों के कल्ले याद आते हैं

-अमित

चित्र - गूगल से साभार

Tuesday, December 4, 2012

गीत - आकुल हो तुम बाँह पसारे



आकुल हो तुम बाँह पसारे
किन्तु देहरी पर रुक जाते
असमंजस में पाँव तुम्हारे

अवहेलना जगत की करता
है, मन का व्याकरण निराला
किन्तु रीतियों की वेदी पर
जलते स्वप्न विहँसती ज्वाला
सब कुछ धुँधला-धुँधला दिखता
नयन-नीर की नदी किनारे
आकुल हो तुम बाँह पसारे

समझौतों में जीते-जीते
मरुथल होती हृद्‌-फुलवारी
मृदुजल का यदि स्रोत मिले तो
विस्मय करती दुनिया सारी
शुष्क काष्ठ पूजित होते हैं
काटे जाते हरे जवारे
आकुल हो तुम बाँह पसारे

पीड़ा, घुटन, असंतोषों को
हँस कर सह लेना वाँछित है
मन के अविकल भाव प्रदर्शन
की प्रत्येक कला लाँछित है
नियति बता कर चुप करने को
तत्पर हैं उपदेशक सारे
आकुल हो तुम बाँह पसारे

जड़ता का व्यामोह तोड़ना
प्रायः यहाँ असम्भव सा है
लहू-लुहान पंख हैं फिर भी
पिंजरों का अभिमान सुआ है
मुक्ति-कामना असह हुई तो
पहुँचा देती संसृति पारे
आकुल हो तुम बाँह पसारे

-अमित