Tuesday, October 6, 2009

नवगीत - रिश्तों का व्याकरण


(यह नवगीत, नवगीत की पाठशाला के लिए लिखा था| 
इसे आप अनुभूति में भी देख सकते हैं|)


अनुकरण की
होड़ में अन्तःकरण चिकना घड़ा है
और रिश्तों का पुराना व्याकरण
बिखरा पड़ा है।
 

दब गया है
कैरियर के बोझ से मासूम बचपन
अर्थ-वैभव हो गया है सफलता का सहज मापन
सफलता के
शीर्ष पर जिसके पदों का हुआ वन्दन
देखिये किस-किस की गर्दन को
दबा कर वो खड़ा है।
और रिश्तों का पुराना व्याकरण
बिखरा पड़ा है।

सीरियल के
नाटकों में समय अनुबंधित हुआ है
परिजनो से वार्ता-परिहास क्रम
खंडित हुआ है
है कुटिल
तलवार अंतर्जाल का माया जगत भी
प्रगति है यह या कि फिर विध्वंस
का खतरा बड़ा है।
और रिश्तों का पुराना व्याकरण
बिखरा पड़ा है।

नग्नता
नवसंस्कृति की भूमि में पहला चरण है
व्यक्तिगत स्वच्छ्न्दता ही प्रगतिधर्मी
आचरण है
नई संस्कृति के नये
अवदान भी दिखने लगे अब
आदमी अपनी हवस की दलदलों
में जा गड़ा है
और रिश्तों का पुराना व्याकरण
बिखरा पड़ा है।

--अमित

मेरी रचनाये (http://amitabhald.blogspot.com)
Mob: +919450408917

Sunday, October 4, 2009

ग़ज़ल - यूँ चम्पई रंगत प सिंदूरी निखार है

एक रवायती (पारंपरिक) ग़ज़ल प्रस्तुत है|


यूँ चम्पई रंगत प सिंदूरी निखार है
इंसानी पैरहन में गुले-हरसिंगार है।

धानी से दुपट्टे में बसंती सी हलचलें
मौज़े-ख़िरामे-हुस्न कि फ़स्ले-बहार है।

गुजरा है कारवाने-क़ायनात इधर से
ये कहकशाँ की धुन्ध भी मिस्ले-गुबार है।

जिस पर भी पड़ गयी है निगहे-नाज़े-सरसरी
इंसाँ नियाजे-हुस्न का उम्मीदवार है।

आतिश जले कहीं भी पहुँचते हैं फ़ित्रतन
दीवानगी का अहद भी परवानावार है।

क्यूँ हुस्न प लगती रही पाक़ीज़गी की शर्त
पूछा कभी कि इश्क़ भी परहेजगार है।

इतने क़रीब से भी न गुजरे कोई 'अमित'
गो आग बुझ भी जाय प रहता शरार है।


अमित
शब्दार्थ:
पैरहन = वस्त्र, मौज़े-ख़िरामे-हुस्न = सौन्दर्य के चाल की तरंग, फ़स्ले-बहार= बसन्त
निगहे-नाज़े-सरसरी = मान से उक्त सरसरी निगाह,कहकशाँ= आकाश गंगा, मिस्लेगुबार = गुबार की तरह
नियाजे-हुस्न = हुस्न की कृपा, फ़ित्रतन = स्वाभाविक रूप से, अहद = प्रतिज्ञा, परवानावार = परवानो की तरह
पाक़ीज़गी = पवित्रता, परहेजगार= संयमी, शरार = चिंगारी।