Saturday, April 10, 2010

मैने देखा....





मैनें देखा,
मैनें देखा
जीर्ण श्वान-तनया के तन से
लिपट रहे कुछ मोटे झबरीले पिल्लों को
रक्त चूसते से थे जैसे शुष्क वक्ष से
मुझे याद आई धरती की।

मैनें देखा,
मैनें देखा
क्षीणकाय तरुणी, वृद्धा सी
लुंचित केश, वसन मटमैले, निर्वसना सी
घुटनों को बाँहों में कस कर देह सकेले
मुझे याद आई गंगा की।

मैनें देखा,
मैनें देखा
बीड़ी से चिपके बचपन को
कन्धे पर बोरा लटकाये, मनुज-सुमन को
सड़ते कचरे से जो बीन रहा जीवन को
मुझे याद आई प्रायः सूकर छौनों की।

मैनें देखा,
मैनें देखा
कमरे की दीवाल-घड़ी का सुस्त पेण्डुलम
धक्कों से ठेलता समय को, धीरे-धीरे
टन-टन की ध्वनि भी आती ज्यों दूर क्षितिज से
मुझे याद आई दादी की।

मैनें देखा,
मैनें देखा
गया न देखा फिर कुछ मुझसे
दिनकर के वंशज समस्त ले रहे वज़ीफे
अंधियारों से
मंचों पर सन्नाटा फैला, आती है आवाज़ सिर्फ़ अब,
गलियारों से
आँखें करके बन्द सोचता हूँ अच्छा है
नेत्रहीन होने का सुख कितना सच्चा है
तब से आँख खोलने में भी डर लगता है
रहता है कुछ और, और मुझको दिखता है।


अमित




--
रचनाधर्मिता (http://amitabhald.blogspot.com)
Mob: +919450408917

17 comments:

दिलीप said...

Dil jeet liya aapki rachna ne...pata nahi kitna kuch ajjeb sa padhta hun roz blog pe ajeeb si tippaniyan bhi...jo shayad bina padhe hi de di jaati hain....par aapne bahut srahniya kalam chalayi....dekhiye abhi 'nice', badhiya prastuti jaise comments bhi aayenge...

http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

पारूल said...

बहुत बढ़िया अमित जी , रचना के साथ सस्वर पाठ भी

गिरिजेश राव said...

इसके पहले भी अपनी सारी कविताएँ कुछ ब्लॉगरों की रचनाओं पर न्यौछावर कर चुका हूँ।
आज इस रचना पर सब न्यौछावर बन्धु! सब रचनाएँ-केवल उच्छिष्ट नहीं।
इतनी स्पष्टता, इतनी सुगढ़ता, इतनी ..न जाने क्या क्या, बहुत दिनों के बाद पढ़ने को मिली।
मंच परम्परा के गरिमामय कवियों की स्मृति हो आई।
इसे कहते हैं - कविता।
आभार।

वन्दना said...

सच्चाई को बखुबी प्रस्तुत किया है………………एक नये अन्दाज़ में………………।्विचारणीय प्रस्तुति।

मानसी said...

सशक्त कविता व सुंदर प्रस्तुति।

Rajesh Mishra said...

what a nice thought... with your voice...

हिमांशु । Himanshu said...

"आँखें करके बन्द सोचता हूँ अच्छा है
नेत्रहीन होने का सुख कितना सच्चा है
तब से आँख खोलने में भी डर लगता है
रहता है कुछ और, और मुझको दिखता है।"

पूरी कविता का तनाव अदभुत है ! इन पंक्तियों से हुआ अंत तो अदभुत है ! ब्लॉग की इधर लिखी सर्वश्रेष्ठ कविताओं में से एक ! हतप्रभ, मुग्ध, मौन !

आभार ।

बेचैन आत्मा said...

दिनकर के वंशज समस्त ले रहे वज़ीफे
अंधियारों से
मंचों पर सन्नाटा फैला, आती है आवाज़ सिर्फ़ अब,
गलियारों से
--वाह! आपकी इस कविता ने मेरा मन मोह लिया। इतने सटीक बिंब.. सफल जीवन चित्रण... और करारा व्यंग्य। सबकुछ है आपकी इस कविता में।
--बधाई।

Udan Tashtari said...

बहुत गज़ब!! शानदार रहा सस्वर पाठ.

प्रवीण पाण्डेय said...

गजब की कविता ।

sanjay singh said...
This comment has been removed by the author.
sanjay singh said...

maine paya"maine dekha"vastvikakta ke dharatal par kheenchi gayi ek kunchi sundar,

shabd saushtabh sundar,
bhaav goodh prashan? abujhe bahut hi sundar.
singh swar sa dheer gambheer
vaachan sundartam sundar.

श्रद्धा जैन said...

aapki rachna padhkar man stabadh hai.....

aapki kavitayen gazlen sabhi man ko moh leti hai
shabad ka chayan .....aur vichar sab uchch koti ke

Shardula said...

कविता तो है ही झकझोरती सी, आज पॉडकास्ट सुना. अति उत्तम!

anurag said...

wah...chacha ji...vastav me aaj se do mahine pehle ye kavitaye ,ye gazal mjhe kattai aakarshit nai karte the...parantu jab se aapke blog ka daily visitor hua hu....inse mjhe aseem anand ki prapti ho rahi hai...

Suman said...

nice

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

is rachna pe kitna kuch kaha ja sakta hai .... kitni sari baaten dekheen aapne...aur nazar yahi hoti hai .. jo sach ke peeche ka sach dekhe... badhai aisi rachna ke liye