Wednesday, December 29, 2010

गीत - फिर क्यों मन में संशय तेरे!



फिर क्यों मन में संशय तेरे!

जब-जब दीप जलाये तूने

दूर हुये हैं घने अंधेरे
फिर क्यों मन में संशय तेरे!

स्वयं शीघ्र धीरज खोता है
क्रोध! कि ऐसा क्यों होता है
नियति नवाती शीश उसी को
जो सनिष्ठ इक टेक चले रे
फिर क्यों मन में संशय तेरे!

वीर पराजित हो सकते हैं
जय की आस नहीं तजते हैं
निश्प्रभ होकर डूबा सूरज 
तेजवन्त हो उगा सवेरे
फिर क्यों मन में संशय तेरे!

जग में ऐसा कौन भला है
जिस पर समय न वक्र चला है
धवल-वर्ण हिमकर को भी तो
ग्रस लेते हैं तम के घेरे
फिर क्यों मन मे संशय तेरे!

मान झूठ अपमान झूठ है
जीवन का अभिमान झूठ है
जग-असत्य की प्रत्यंचा पर
सायक हैं माया के प्रेरे
फिर क्यों मन में संशय तेरे!


--अमित

Sunday, December 26, 2010

गीत - सपनों को कल रात जलाया



सपनों को कल रात जलाया

हर करवट पर चुभते थे जो
घुटन  बढ़ाते घुटते  थे जो
मुझे पीसते पिसते  थे जो
रोते कभी सिसकते थे जो
मन पर भारी पत्थर रख कर
उन्हें विदा का शीश नवाया
सपनों को कल रात जलाया

सुबह राख़ से झाँक रहे थे
मुझ विस्मित को ताक रहे थे
मेरे मन को आँक रहे रहे थे
मन की दरकन टाँक रहे थे
उनकी मन्दस्मित रेखा से 
मन ही मन मैं बहुत लजाया
सपनो को कल रात जलाया

सपनों में संवाद छिड़ा है
और बीच में मौन खड़ा है
जीवन बड़ा कि स्वप्न बड़ा है
तर्कों का इक बोझ पड़ा है
स्वप्न-प्रलोभन में आकर के
मैंने ही ख़ुद को भरमाया
सपनों को कल रात जलाया

स्वप्नों से अब बोल रहा हूँ
मन की पीड़ा खोल रहा हूँ
अच्छे शब्द टटोल रहा हू
हर अवसर को तोल रहा हूँ
स्वप्नों मुझे छोड़ दो भाई
आर्तनाद कर मैं चिल्लाया
सपनो को कल रात जलाया

लेगा कोई ज़िम्मेदारी?
स्वप्नों की दे रहा सुपारी
मैंने तो ये बाज़ी हारी
जीत गया फिर वक़्त शिकारी
रक्तबीज के वंशज स्वप्नों
मुझको ही क्यों लक्ष्य बनाया
सपनों को कल रात जलाया

--अमित

Sunday, November 21, 2010

एक सरल सा गीत





आओ साथी जी लेते हैं
विष हो  या अमृत हो जीवन
सहज भाव से पी लेते हैं

सघन कंटकों भरी डगर है
हर प्रवाह के साथ भँवर है
आगे हैं संकट अनेक, पर
पीछे हटना भी दुष्कर है।
विघ्नों के इन काँटों से ही
घाव हृदय के सी लेते हैं
आओ साथी जी लेते है

नियति हमारा सबकुछ लूटे
मन में बसा घरौंदा टूटे
जग विरुद्ध हो हमसे लेकिन
जो पकड़ा वो हाथ न छूटे
कठिन बहुत पर नहीं असम्भव
इतनी शपथ अभी लेते हैं
आओ साथी जी लेते है

श्वासों के अंतिम प्रवास तक
जलती-बुझती हुई आस तक
विलय-विसर्जन के क्षण कितने
पूर्णतृप्ति-अनबुझी प्यास तक
बड़वानल ही यदि यथेष्ट है
फिर हम राह वही लेते हैं
आओ साथी जी लेते हैं

--अमित 

Thursday, November 4, 2010

दीपावली पर दो छन्द शार्दूलविक्रीड़ित के


शार्दूलविक्रीड़ित


यह १९ वर्णों का गणात्मक, यत्यात्मक वार्णिक छंद है जिसमें १२वें एवं १९वें वर्ण पर यति होती है
गणों का क्रम इस प्रकार है। (इस प्रगल्भता के लिये क्षमा करेंगे और यदि कोई त्रुटि हो तो अवश्य इंगित करें। प्रसिद्ध सरस्वती वन्दना- 'या कुन्देन्दु तुषार हार.... ' इसी छंद में है)


मगण सगण जगण सगण, तगण तगण गुरु
ऽऽऽ   ।। ऽ  ।ऽ।   ।।ऽ    ऽऽ।  ऽऽ।   ऽ 

जागी श्याम-विभावरी शुभकरी, दीपांकिता वस्त्रिता
कल्माशांतक ज्योति शुभ्र बिखरी, आलोकिता है निशा
ज्योतिष्मान स्वयं प्रतीचिपट से, सन्देश देता गया
दीपों की अवली प्रदीप्त कर दे, संपूर्ण पुण्या धरा

राकानाथ निमग्न हैं शयन में, तारावली दीपिता
तारों का प्रतिबिम्ब ही अवनि में, दीपावली सा बना
लक्ष्मी भी तज क्षीर-धाम उतरीं, देखी जु शोभा घनी
देतीं सी सबको प्रबोध मन में, जैसे सुसंजीवनी


-अमित


Tuesday, November 2, 2010

तीन मुक्तक


होली से 
दीवाली तक 























आत्म-केन्द्रित जग सीमित है अपनी ही खुशहाली  तक
अर्थहीन     शब्दों  से    लेकर  चिन्तन   की कंगाली तक
ऋतु-परिवर्तन     भी  शायद इनको  परिभाषित करता हो
जब   रिश्तों  की    मीयादें     हों   होली  से  दीवाली  तक

मेरी    जाती    कमी से लगते हो
किसी    खोई    ख़ुशी से लगते हो
जब से दुश्मन से मिलके आये हो
दोस्त, तुम अज़नबी से लगते हो


कुछ बातों कुछ संकेतों को प्यार समझ बैठे थे हम
कुछ वादों को जीवन का आधार समझ बैठे थे हम
नया  नहीं कुछ हुआ, भरोसे  टूटा करते  आये  हैं,

हाँ, उधार को ग़लती से उपहार  समझ बैठे थे हम

-अमित

Wednesday, October 13, 2010

स्वगत - २

दुस्तर अगाध भवनिधि में
है दिवास्वप्न की तरणी
शत घूर्णावर्त तरंगे
मथ देतीं जैसे अरणी

पथ निन्दित या अभिनन्दित
संकल्प-विकल्प-अनिश्चय
निज-कर्म-विपाक करेगा
किस पाप-पुण्य का संचय

ज्यों सूक्ष्म भार अंतर से
हो स्वर्ण-तुला में दोलन
लघु लाभ-हानि की गणना
करती मन में आड़ोलन

हैं सुख के क्षण उल्का से
जीवन की अमा-निशा में
तारक-मणियों से मण्डित
नभ, यद्यपि सभी दिशा में

संघर्ष विषय-संयम का
लेता नित नई परीक्षा
प्रायः अनंग के शर से
हो गई बिद्ध गुरु-दीक्षा

विचलन ही है यदि प्रचलन
तब चलन अरक्षित ऐसे
स्वानों के संरक्षण में
हो भोज्य सुरक्षित जैसे

किस प्रेरक की इच्छा से
आकर्षण और विकर्षण
विपरीत वायु के बल से
होते देखा है वर्षण

उत्तर अनेक प्रश्नों का
बस मात्र एक चुप्पी है
सृष्टा की सब मर्यादा
आकर के यहीं छिपी है

अमित

Sunday, October 10, 2010

स्वगत - 1

माया विस्तीर्ण जगत की
छल की प्रपंच की छाया
प्रतिविम्ब न ठहरे क्षण भर
हिलती दर्पण की काया

कुछ सघन निराशा के पल
सुधियों से निज संघर्षण
हम समर छोडते फिरते
पर पीछे पड़ जाते रण

विश्वास-विटप उन्मूलित
कामना-कलित झंझा से
अंकुर-अभिलाषा फिर भी
क्यों भ्रूणहीन बंझा से

जैसे प्रवाल कोटर में
मत्स्या के चंचल फेरे
कुछ ध्वनियाँ आती-जाती
रहतीं मस्तके में मेरे

शीशे के नग को पहना
हीरक-मुद्रिका समझ कर
पर वह भी आत्म-विमोहित
जा निकला दूर छिटक कर

अनु्गूँज उठा करती है
प्रायः मानस-तलघर में
कुछ सघन तरंगे आकर
छा जातीं विश्वंकर में

चंचल मन बैठ न पाये
रख धैर्य-शिला पर आसन
उद्धत इंद्रियाँ तोड़तीं
मर्यादा का अनुशासन

अद्भुत रहस्य संकुल सा
मानव मन अगम पहेली
इच्छायें चपल नटी सी
करती रहतीं अठखेली
क्रमशः...

अमित
शब्दार्थ: विश्वंकर = आँख

Friday, September 24, 2010

नवगीत - एक प्रवासी



















लौट! घर चल मुसाफ़िर

कहाँ अब आसरा परदेश में है
यहाँ छल
का चलन हर वेश में है
नेह के नीर आँखों में नहीं हैं
स्वार्थ के रेशमी कल हर कहीं हैं
बहुत रोका तुझे
बरबस गया फिर
लौट! घर चल मुसाफ़िर

तेरा अधिवास तेरे गाँव में है
भले ही पेड़ की लघु छाँव में है
यहाँ कितना! बसेरे का किराया
दण्ड भी! यदि न वादे पर चुकाया
गया कोई तो
आया है नया फिर
लौट! घर चल मुसाफ़िर

शहर की याद होगी साथ तेरे
नियति की वर्तिका पर शलभ-फेरे
 
जहाँ घुमड़े कभी बादल घनेरे
वहीं मरुथल ने डाले आज डेरे
न आशा में कोई
दीपक जला फिर
लौट! घर चल मुसाफ़िर

Sunday, September 5, 2010

ग़ज़ल - तलाशे-इश्क़ में सारी उमर तमाम हुई

















तलाशे-इश्क़ मे सारी उमर तमाम हुई
आके दहलीज पे इक बेवफ़ा के शाम हुई

ग़मे-फ़िराक़, ग़मे-कार, ग़मे-तनहाई
ज़िन्दगी रोज़ नये हादिसों के नाम हुई

क़त्ल उम्मीद हुई लब से पयाला फिसला
मजाले-ज़ीस्त थी जो शै वही हराम हुई

कौन क्या राज़ छुपाये है किसे क्या मालूम
नवाये-नफ़स भी मेरी सदाये-आम हुई

पैकरे-ख़ाक को फिर खा़क में मिलना है ’अमित’
है ये अफ़सोस के मिट्टी मेरी बदनाम हुई
अमित
शब्दार्थः- ग़मे-फ़िराक़= वियोग का दुःख; ग़मे-कार= कार्य या उद्यम का दुःख; ग़मे-तनहाई=एकाकी होने का दुःख; हादिसों = दुर्घटनाओं, विपत्तियो; मजाले-ज़ीस्त = जीवन की शक्ति; नवाये-नफ़स=साँस की आवाज़; सदाये-आम=सामान्यजन की पुकार; पैकरे-ख़ाक=मिट्टी का शरीर।

Tuesday, July 13, 2010

ग़ज़ल - अब ’अमित’ अन्जुमन से जाते हैं






















बाइसे-शौक आजमाते हैं
कितने मज़बूत अपने नाते हैं

रोज़ कश्ती सवाँरता हूँ मैं
कुछ नये छेद हो ही जाते हैं

बाकलमख़ुद बयान था मेरा
अब हवाले कहीं से आते हैं

जिनपे था सख़्त ऐतराज़ उन्हे
उन्हीं नग़्मों को गुनगुनाते हैं

शम्मये-बज़्म ने रुख़ मोड़ लिया
अब ’अमित’ अन्जुमन से जाते हैं


'अमित' 
बाइसे-शौक = शौक के लिये,

Wednesday, June 30, 2010

ग़ज़ल - अज़नबी अबके आश्ना सा था





















मैं बहरहाल बुत बना सा था
वो भी मग़रूर और तना सा था

कुछ शरायत दरख़्त ने रख दीं
वरना साया बहुत घना सा था

साक़िये-कमनिगाह से अर्ज़ी
जैसे पत्थर को पूजना सा था

ख़ूब दमसाज़ थी ख़ुशबू लेकिन
साँस लेना वहाँ मना सा था

दर्द से यूँ तो नया नहीं था 'अमित'
अज़नबी अबके आश्ना सा था

अमित
शब्दार्थ:
शरायत = शर्त का बहुवचन, साक़िये-कमनिगाह = पक्षपात करने वाला साक़ी, दमसाज़ = प्राणदायक,
त‍अर्रुफ़ = परिचय, आश्ना = परिचित

Wednesday, May 26, 2010

ग़ज़ल - सहल इस तरह ज़िन्दगी कर दे

सहल इस तरह ज़िन्दगी कर दे
मुझपे एहसाने-बेख़ुदी कर दे

आरज़ू ये नहीं कि यूँ होता
आरज़ू है कि बस यही कर दे

हिज़्र की आग से तो बेहतर है
ये मुलाक़ात आख़िरी कर दे

ऐ नुजूमी जरा सितारों पर
हो सके थोड़ी रोशनी कर दे

दास्ताने-सफ़र 'अमित' शायद
उनकी आँखे भी शबनमी कर दे

'अमित'
नुजूमी = ज्योतिषी

Saturday, April 10, 2010

मैने देखा....





मैनें देखा,
मैनें देखा
जीर्ण श्वान-तनया के तन से
लिपट रहे कुछ मोटे झबरीले पिल्लों को
रक्त चूसते से थे जैसे शुष्क वक्ष से
मुझे याद आई धरती की।

मैनें देखा,
मैनें देखा
क्षीणकाय तरुणी, वृद्धा सी
लुंचित केश, वसन मटमैले, निर्वसना सी
घुटनों को बाँहों में कस कर देह सकेले
मुझे याद आई गंगा की।

मैनें देखा,
मैनें देखा
बीड़ी से चिपके बचपन को
कन्धे पर बोरा लटकाये, मनुज-सुमन को
सड़ते कचरे से जो बीन रहा जीवन को
मुझे याद आई प्रायः सूकर छौनों की।

मैनें देखा,
मैनें देखा
कमरे की दीवाल-घड़ी का सुस्त पेण्डुलम
धक्कों से ठेलता समय को, धीरे-धीरे
टन-टन की ध्वनि भी आती ज्यों दूर क्षितिज से
मुझे याद आई दादी की।

मैनें देखा,
मैनें देखा
गया न देखा फिर कुछ मुझसे
दिनकर के वंशज समस्त ले रहे वज़ीफे
अंधियारों से
मंचों पर सन्नाटा फैला, आती है आवाज़ सिर्फ़ अब,
गलियारों से
आँखें करके बन्द सोचता हूँ अच्छा है
नेत्रहीन होने का सुख कितना सच्चा है
तब से आँख खोलने में भी डर लगता है
रहता है कुछ और, और मुझको दिखता है।


अमित




--
रचनाधर्मिता (http://amitabhald.blogspot.com)
Mob: +919450408917

Thursday, March 25, 2010

ग़ज़ल - वो मेरे हक़ के लिये मेरा बुरा करते हैं।


अब अंधेरों में उजालों से डरा करते हैं
ख़ौफ़, जुगनूँ से भी खा करके मरा करते हैं

दिल के दरवाजे पे दस्तक न किसी की सुनिये
बदल के भेष लुटेरे भी फिरा करते हैं

उनका अन्दाज़े-करम उनकी इनायत है यही
वो मेरे हक़ के लिये मेरा बुरा करते हैं

गुनाह वो भी किये जो न किये थे मैंने
यूँ कमज़र्फ़ों के किरदार गिरा करते हैं

तंज़ करके गयी बहार भी मुझपे ही 'अमित'
कभी सराब भी बागों को हरा करते हैं

अमित

शब्दार्थ:
अन्दाज़े-करम = कृपा करने का तरीका, इनायत = कृपा, कमज़र्फ़ों = तुच्छ लोगों, किरदार = चरित्र, तंज़ = कटाक्ष, सराब(फ़ारसी पुल्लिंग) = मृगतृष्णा या मृगजल।

Friday, March 19, 2010

गज़ल - झूठ का पर्दा खोला जाए|


झूठ का  पर्दा  खोला  जाये
फिर, सच को भी तोला जाये

पीछे खुसुर-फुसुर से बेहतर
मुँह पर ही कुछ बोला जाये

धधक उठेगी आग वहाँ तक
जहाँ  बात  का  शोला जाये

औरों की  नीयत से  पहले
खु़द को चलो  टटोला जाये

धूप हक़ीक़त की पड़ते ही
पिघल मोम सा चोला जाये

सीले   बारूदों   से   कैसे
इंकिलाब का गोला जाये

पब्लिक को पैदल करके वो
चढ़ कर उड़नखटोला  जाये

मुखिया कैसा, अपने दम पर
जिससे चला न डोला  जाये

ताक़त दिखलाने का नुस्ख़ा
ज़हर फ़ज़ा  में घोला  जाये

चढ़ती - गिरती  हैं   उम्मीदें
जैसे  कोई    हिंडोला  जाये

'अमित' क्रोध और लाचारी से
दिल पर निकल फफोला जाये


-- अमित 
शब्दार्थ:  फ़ज़ा = माहौल, वातावरण।
(चित्र: गूगल से साभार)

Tuesday, March 16, 2010

नवगीत - कुछ तो कहीं हुआ है



कुछ तो कहीं हुआ है, भाई
कुछ तो कहीं हुआ है
झमझम बारिश है बसंत में
सावन में पछुआ है
कुछ तो कहीं हुआ है

हुई कूक कोयल की गायब
बौर लदी अमराई गायब
सरसों फूली सहमी-सहमी
फागुन से अँगड़ाई गायब
मौसम-चक्र पहेली जैसा
मानव ज्यों भकुआ है
कुछ तो कहीं हुआ है

जीवन से जीविका बड़ी है
मन, मौसम में जंग छिड़ी है
मानव का अस्तित्त्व गौण है
नास्डॉक पर नज़र गड़ी है
पीछे गहरी खाँई उसके
आगे पड़ा कुआँ है
कुछ तो कहीं हुआ है

तुलसी-सूर-कबीर कहाँ तक
देगें साथ फ़कीर कहाँ तक
घोर कामना के जंगल में
राह दिखायें पीर कहाँ तक
राम नाम जिह्वा पर लेकिन
चिन्तन में बटुआ है
कुछ तो कहीं हुआ है


-- अमित
नास्डॉक = नैज़्डॉक = NASDAQ = National Association of Securities Dealers Automated Quotations
भकुआ (देशज शब्द) = हतबुद्धि।

Saturday, March 13, 2010

ग़ज़ल - बजाहिर खूब सोना चाहता हूँ



बजाहिर खूब सोना चाहता हूँ
हक़ीक़त है कि रोना चाहता हूँ


अश्क़ आँखों को नम करते नहीं अब
जख़्म यादों से धोना चाहता हूँ


वक़्त बिखरा गया जिन मोतियों को
उन्हे फिर से पिरोना चाहता हूँ


कभी अपने ही दिल की रहगुजर में
कोई खाली सा कोना चाहता हूँ


नई शुरूआत करने के लिये फिर
कुछ नये बीज बोना चाहता हूँ।


गये जो आत्मविस्मृति की डगर पर
उन्ही में एक होना चाहता हूँ।


भेद प्रायः सभी के खुल चुके हैं
मैं जिन रिश्तों को ढोना चाहता हूँ


नये हों रास्ते मंजिल नई हो
मैं इक सपना सलोना चाहता हूँ।


’अमित’ अभिव्यक्ति की प्यासी जड़ो को
निज अनुभव से भिगोना चाहता हूँ।

Friday, March 12, 2010

एक मुक्तक दो सन्दर्भ

कभी एक मुक्तक श्रृंगार का लिखा था| बाद में परिवेश बदला सन्दर्भ बदले तो सौंदर्य के प्रतिमान भी बदले| पहले मुक्तक में शास्त्रीय अलंकरण हैं| बाद में इसे मैंने आज के परिदृश्य में रखना चाहा तो इसमे सौन्दर्य की जगह हास्य उत्पन्न हो गया| आप स्वयं देखें और निर्णय दें|
(१९९१)
गाँव ख़ुशबू का बस गया होगा, तुम जहाँ फूल से खिले होगे
रस्ते-रस्ते  मचल उठे होंगे, जिनपे  तुम दो कदम चले होगे
नूपुर औऽ हार, कंगन औऽ काजल, भाग्य अपना सराहते होंगे
वो तो पागल ही हो गया होगा जिससे तुम एक पल मिले होगे

(२०१०)
मॉल ख़ुशबू का बन गया होगा, तुम जो परफ़्यूम से खिले होगे
सारे रस्ते मचल उठे होंगे,  जिनपे  तुम  कार  से चले होगे
जींस और टॉप, चस्मा औऽ सेल्युलर भाग्य अपना सराहते होंगे
वो तो बेमौत मर गया होगा जिससे तुम हाय! कर चले होगे


--अमित 

Sunday, March 7, 2010

गज़ल - थोड़े मतभेद हो गये


थोड़े मतभेद हो गये
निष्ठा में छेद हो गये

रक्त-संग रक्त थे मगर
निकले तो स्वेद हो गये

आई जब इश्क़ की समझ
बाल ही सफ़ेद हो गये

अनपढ़ के अटपटे वचन
समझा तो वेद हो गये

ऐसा कुछ हो गया 'अमित'
अपने ही खेद हो गये



अमित

Saturday, March 6, 2010

एक क़ता

दिल न होने से तो पत्थर का भी दिल अच्छा है
नाला-ए-हक़ पे किसी रोज़ धड़क सकता है
पौध शोलों की लगाने से पेशतर सोचो
कभी ये अपने भी दामन में भड़क सकता है


अमित
नाला-ए-हक़ = सत्य की चीत्कार

Thursday, March 4, 2010

एक आरम्भिक कविता

पुरानी डायरी के पन्नों से आरम्भिक काल की एक कविता मिल गई है। आप से बाँटने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। आप देख कर जान ही जायेंगे कि शैली जय शंकर प्रसाद जी से प्रभावित है।

आज भी वहीं खड़ा उद्दीप्त
विश्वधारा में मैं निरुपाय
खोजता हूँ बस एक आलम्ब
यजन करने का तुच्छ उपाय

निशा है आज हुई शशि-मुक्त
किरण भी आशा की है लुप्त
जानता होगा विश्वाधार
जीव  फिर
क्यों शरीर से युक्त

संकलित है स्मृति अवशेष
भग्न उस रेत-भीति के चिह्न
जिसे देने को नूतन रूप
हो गये थे दो पथिक अभिन्न

जीव का प्रेम जीव से किन्तु
शरीरों का कैसा भ्रम जाल
रहा करता जल सागर मध्य
हो सका क्या जलगत पाताल

हवा गति हेतु चाहती दाब
नदी को नीचे तल की चाह
किन्तु भौतिक नियमों से दूर
भावनाओं का अतुल प्रवाह

जिसे पाने में लगते वर्ष
बीत जाते कितने मधुमास
वही क्षण रुकते यदि पल चार
न हटता मन से निज विश्वास

हो गई उषा भी तमलिप्त
खो गया उसका भी अभिमान
क्षितिज के बीच बैठती कभी
पहनकर कुछ अरुणिम परिधान

इन्दु ने अपनी किरण समेट
समय से पूर्व किया प्रस्थान
साथ देने तारा-नक्षत्र
हो गये हैं सब अन्तर्ध्यान

इस अंधेरे में किसी के नाम का दीपक जलाये
ढूँढता बिछड़े स्वजन को भूल वो इस राह आये

भूल वो इस राह आये।
अमित (१६ नवम्बर १९८०)

Tuesday, February 23, 2010

ग़ज़ल - एक मासूम से ख़त पर बवाल कितना था

एक मासूम से ख़त पर बवाल कितना था
उस हिमाकत का मुझे भी मलाल कितना था

मेरे हाथों पे उतर आई थी रंगत उसकी
सुर्ख़ चेहरे पे हया का गुलाल कितना था

मैं अगर हद से गुजर जाता तो मुज़रिम कहते
और बग़ावत का भी दिल में उबाल कितना था

काँच सा टूट गया कुछ मगर झनक न हुई
जुनूँ में भी हमें सबका ख़याल कितना था

हश्र यूँ मेरे सिवा जानता था हर कोई
मैं अपने हाल पे ख़ुद ही निहाल कितना था

आज भी एक पहेली है मेरे सिम्त 'अमित'
उस तबस्सुम की गिरह में सवाल कितना था

अमित
शब्दार्थ: मुक़द्दस हिलाल = पवित्र नया चाँद, तबस्सुम = मुस्कान

Friday, February 19, 2010

ग़ज़ल - बहुत सहज हो जाने के भी अपने खतरे हैं|

बहुत सहज हो जाने के भी अपने ख़तरे हैं
लोग समझने लगते हैं हम गूँगे-बहरे हैं

होरी को क्या पता नहीं, उसकी बदहाली से
काले ग्रेनाइट पर कितने हर्फ़ सुनहरे हैं

धड़क नहीं पाता मेरा दिल तेरी धड़कन पर
मंदिर-मस्ज़िद-गुरुद्वारों के इतने पहरे हैं

पढ़-लिख कर मंत्री हो पाये, बिना पढ़े राजा
जाने कब से राजनीति के यही ककहरे हैं

निष्ठा को हर रोज़ परीक्षा देनी होती है
अविश्वास के घाव दिलों में इतने गहरे हैं

मैं रोया तो नहीं नम हुई हैं फिर भी आंखें
और किसी के आँसू इन पलकों पर ठहरे हैं

बौनो की आबादी में है कद पर पाबन्दी
उड़ने लायक सभी परिन्दो के पर कतरे हैं



अमित

Wednesday, February 10, 2010

गज़ल - इक लम्हा खु़शी के लिये दुनिया सफ़र में है (पुरानी)

१९८६-८७ में लिखी गयी गज़ल प्रेषित कर रहा हूँ|
इक लम्हा खु़शी के लिये दुनिया सफ़र में है
मालूम नहीं दर तेरा किस रहगुजर में है

मुरझा चुकी हैं खिल के तमन्नायें नामुराद
गोया हमारा दिल भी किसी तंग दर में है

मैं भी बुझूँगा एक दिन और तू भी आफ़ताब
फिर इतनी तपिश क्यूँ तेरी तिरछी नज़र में है

फ़ित्रत है एक जैसी सितारों की जमी की
इक जल रहे हैं दूसरी जलते शहर में है

ऐ तालिबाने-फ़िरक़ापरस्ती कभी तो सोच
ये आग फूँक देगी जो कुछ तेरे घर में है

हम आये मदावाये-दिलआज़ुर्दः को 'अमित'
इक वहशियाना भूक मिरे चाराग़र में है

अमित (१९८६)

तालिबाने-फ़िरक़ापरस्ती = साम्प्रदायिकता के विद्यार्थीगण। मदावाये-दिलआज़ुर्दः = दुखी हृदय के उपचार के लिये। चाराग़र=उपचारक, वैद्य।

Monday, January 25, 2010

अहम की ओढ़ कर चादर

अहम की ओढ़ कर चादर
फिरा करते हैं हम अक्सर

अहम अहमों से टकराते
बिखरते चूर होते हैं
मगर फिर भी अहम के हाथ
हम मजबूर होते हैं
अहम का एक टुकड़ा भी
नया आकार लेता है
ये शोणित-बीज का वंशज
पुनः हुंकार लेता है
अहम को जीत लेने का
अहम पलता है बढ़-चढ़ कर
अहम की ओढ़ कर .....

विनय शीलो में भी अपनी
विनय का अहम होता है
वो अन्तिम साँस तक अपनी
वहम का अहम ढोता है
अहम ने देश बाँटॆ हैं
अहम फ़िरकों का पोषक है
अहम इंसान के ज़ज़्बात का भी
मौन शोषक है
अहम पर ठेस लग जाये
कसक रहती है  जीवन भर
अहम की ओढ़ करे चादर ...

-- अमित

Wednesday, January 20, 2010

हे! हिन्दी के रुद्रावतार! वन्दन है!

आज बसन्त पंचमी है। महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' जी का जन्म-दिन। निराला जी के जन्मवर्ष और दिन के बारे में ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है लेकिन जन्मदिन उनका बसंत को ही मनाया जाता है। आज के ही दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती जी की पूजा होती है। शिक्षण संस्थाओं मे विशेष रूप से। बंगाल में इसे बहुत समारोह पूर्वक मनाते हुये मैने देखा था।
यह दिन सरस्वती के इस वरदपुत्र का भी जन्मदिन हैं। महाप्राण के प्रति श्रद्धा के कुछ शब्द बन गये हैं उन्हे आपके सम्मुख रख कर उस महामनीषी के प्रति मैं अपनी कृतज्ञता ज्ञापित कर रहा हूँ। स्पष्ट कर दूँ कि, उस व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने के लिये मेरी कलम बहुत छोटी है।

हे! हिन्दी के रुद्रावतार!
भाषानिधि अम्बुधि महाकार
कविता-नवीन के शिल्पकार
जीवनी शक्ति जो दुर्निवार
अर्पित तुमको यह पुष्पहार
चन्दन है!

गंगा-यमुना उच्छ्‍वसित धार
कहती निजस्मृति को उघार
तुमसे भवाब्धि भी गया हार
हे पुरुष केशरी नमस्कार
करता युग तुमको बार-बार
वन्दन है!

जड़ता-गज-मस्तक पर प्रहार
कर, सिंहनाद सा स्वर उचार
वह नई चेतना, नव प्रसार
कविता जब पहुँची दीन-द्वार
स्लथ भिक्षुक की बेबस पुकार
क्रन्दन है!

उद्भट ज्ञानी थे तुम भगवद्गीता के
देखे कैसे रामाभ नयन सीता के
झेले थे तुमने विरह स्वपरिणीता के
संतप्त-शोक निज-कन्या सुपुनीता के
कवि अश्रु तुम्हारा, अश्रु नहीं
अंजन है!

हे! सरस्वती के पुत्र, स्वयं चतुरानन
ने गढ़ा तुम्हे देकर गर्वीला आनन
लेखनी-विराजे आकर स्वयं गजानन
वपु जैसे कवि का रूप धरे पंचानन
बिखरी कविता-कौमुदी-कीर्ति जिस कानन
नन्दन है!

हे! हिन्दी के रुद्रावतार
वन्दन है!


अमित

Tuesday, January 19, 2010

एक सवैया (मत्तगयन्द)

संगम क्षेत्र को देख कर एक सवैया फूट पड़ा।
मत्तगयन्द सवैया में सात भगण (ऽ। ।) और और अन्त में दो गुरु होते हैं।
भानुसुता इस ओर बहे, उस ओर रमापति की पगदासी।
साधक सिद्ध सुजान जहाँ, रहते भर मास प्रयाग प्रवासी।
संगम तीर जुटे जब भीर, लगे जन वारिधि की उपमा सी।
धन्य हुआ यह जीवन जो, इस पुण्य धरा का हुआ अधिवासी।


अमित

Sunday, January 10, 2010

ग़ज़ल - हालात से इस तरह परेशान हुये लोग

हालात से इस तरह परेशान हुये लोग
तंग आके अपने आप ही इंसान हुये लोग

जो थे खु़दी पसन्द उन्हे फ़िक्रे-ख़ुदा थी
जो थे खु़दा पसन्द वो हैवान हुये लोग

जिस खूँ से जिस्मो-जाँ में हरारत जुनूँ की थी
वो बह गया सड़क पे तो हैरान हुये लोग

ईमान फ़क़त हर्फ़े-तवारीख़ रह गया
इस दौर में इस क़दर बेईमान हुये लोग

अब दर्द के रिस्तों का जिक्र क्या करें 'अमित'
बस अपनी जान के लिये बेजान हुये लोग


अमित (१९८८)
पहला शेर एक खुश-फ़हम भविष्य कथन (Prophesy) है।
खु़दी पसन्द = अह्म ब्रह्मास्मि (अन-अल-हक़) के तरफ़दार, फ़िक्रे-ख़ुदा = ईश्वर का ध्यान, खु़दा पसन्द =   वाह्याचारी, जिस्मो-जाँ = शरीर और प्राण, हरारत = गर्मी, जुनूँ = जुनून, हर्फ़े-तवारीख़ = इतिहास का शब्द।


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Tuesday, January 5, 2010

सत्य की शोक-सभा


अच्छा हुआ तुम नहीं आये
शोक सभा थी
तुम्हारी ही मृत्यु की
याद किया सभी ने तुम्हें
गुण गाये गये तुम्हारे
रहा दो मिनट?
का मौन भी
चर्चा थी, अंदेसा था सभी को
तुम्हारी मृत्यु का
पुष्टि नहीं की किसी ने
अफ़वाह की
जैसे सभी को प्रतीक्षा थी
इसी बात की
मै भी चुप रहा सब जान कर
फिर सोचा
सच होकर भी शर्मिन्दा हो
क्या सचमुच तुम जिन्दा हो
हर झूठ से डरते हो
मुझे तो लगता है
तुम रोज़ मरते हो
सभा समाप्त हुई
हम घर आये
अब क्यों खड़े हो मुहँ लटकाये
अरे भाई अच्छा हुआ
तुम नहीं आये।

अमित


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