Friday, January 7, 2011

ग़ज़ल - किसी को इतना न चाहो के बदग़ुमा हो जाय


किसी को इतना न चाहो के बदगुमाँ हो जाय
न लौ को इतना बढ़ाओ के वो धुआँ हो जाय

ग़र हो परवाज़ पे पहरा ज़ुबाँ पे पाबन्दी
तो फिर क़फ़स ही मेरा क्यों न आशियाँ हो जाय

न चुप ही गुज़रे न रोकर शबे-फ़िराक़ कटे
तू एक झलक दिखा कर जो बेनिशाँ हो जाय

लोग लेते हैं मेरा नाम तेरे नाम के साथ
कल ये अफ़वाह ही बढ़ कर न दास्ताँ हो जाय

ख़ुशमिज़ाजी भी तेरी मुझको डरा देती है 
तेरा मज़ाक रहे, मेरा इम्तेहाँ हो जाय

सितमशियार कई और हैं तुम्हारे सिवा
कहीं न दर्द मेरा, दर्दे-ज़ाविदाँ हो जाय

भीख में इश्क़ भी मुझको नहीं कुबूल 'अमित'
भले वो जाने-सुकूँ मुझसे सरगिराँ हो जाय

अमित

शब्दार्थ:  परवाज़ = उड़ान, क़फ़स = पिंजरा, शबे-फ़िराक़ = वियोग की रात, सितमशियार = अत्याचार करने वाला/वाले, दर्दे-ज़विदाँ = स्थाई दर्द जो मृत्यु के साथ ख़त्म होता है, जाने-सुकूँ = शान्ति प्रदान करने बाला प्रिय-पात्र, सरगिराँ = रुष्ट, नाख़ुश।

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुतो को यूँ ही धुँआ होते देखा है। बेहतरीन ग़जल।

nivedita said...

खुशमिज़ाज़ी भी मुझ को डरा देती है
बधाई ..