Saturday, October 15, 2011

कुछ दोहे



ठगिनी माया खा गई, पुण्यों की सब खीर
तन जर्जर मन भुरभुरा, आये याद कबीर

आँसू तो चुक-चुक गये, लेकिन चुकी न पीर
जनम गँवाया व्यर्थ में, रह-रह उठे समीर

बन-पर्वत-नदियाँ-पुलिन, कहीं न मिलती ठाँव
प्रियतम की नगरी कहाँ, कहाँ प्रीति का गाँव

दुश्कर प्रीति निबाहना, जैसे पानी-रंग
जल की अंतिम बूँद तक, रंग न छोड़े संग

अनजाने जाने हुये, जाने हुये अजान
नियति नटी के होंठ पर, खेल गई मुस्कान

-अमित




2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बन-पर्वत-नदियाँ-पुलिन, कहीं न मिलती ठाँव
प्रियतम की नगरी कहाँ, कहाँ प्रीति का गाँव

अद्भुत

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

दुश्कर प्रीति निबाहना, जैसे पानी-रंग
जल की अंतिम बूँद तक, रंग न छोड़े संग

Bahut Sunder Dohe...