Saturday, February 28, 2009

ग़ज़ल - याद का इक दिया सा जलता है।

याद का इक दिया सा जलता है।
लौ पकड़ने को दिल मचलता है।


ख़्वाब हो या कि हक़ीक़त दुनियाँ,
दम तो हर हाल में निकलता है।


वक़्त बेपीर है ये मान लिया,
आदमी ही कहाँ पिघलता है।


सरनिगूँ देख कर तुझे ऐ दोस्त,
मुझको अपना वजूद खलता है।


मौत के मुस्तकिल तकाजों में,
एक दिन और यूँ ही टलता है।


अर्श पर शम्स कमल कीचड़ में,
नासमझ देख करके खिलता है।


हमनें इस तरह निभाये रिस्ते,
जैसे कपडे़ कोई बदलता है।


कारवाँ जानें अब कहाँ पहुँचे,
हर कोई अपनी चाल चलता है।


उनके मतलब का रास्ता अक्सर,
मेरी मजबूरियों से मिलता है।


अपनी जिद छोड़ दू ’अमित’ लेकिन,
उनका तेवर कहाँ बदलता है।


- अमित


सरनिगूँ = सर झुका हुआ, लज्जित। मुस्तकिल = सतत। अर्श= आकाश। शम्स = सूर्य।