Monday, March 2, 2009

ग़ज़ल

आशिक यहाँ जुल्फ-ओ-लब-ओ-रुख़्सार बहुत हैं।
पाने को इक झलक ही तलबगार बहुत हैं।


रेशम से भी नाजुक हैं तेरी जुल्फ के रेशे,
कहते हैं मगर इनमें गिरिफ़्तार बहुत हैं।


इतने फ़राख़-दिल तो नहीं लोग यहाँ के,
क्या बात है के उसके मददगार बहुत हैं।


अब दिल में बस गये हो सितम चाहे जो करो,
वरना तो परी-रुख़ सरे संसार बहुत हैं।


किस - किस का भरे जाम कि जब एक है साक़ी,
प्यासे लब-ओ-सागर लिये मैख़्वार बहुत हैं।


पतझड़ था और धूप थी, माली था अकेला,
अब खु़शबू-ए-चमन है तो हक़दार बहुत हैं।


चुपके से देखते हैं दिखावा नहीं करते,
मासूम न कह देना वो हुशियार बहुत हैं।


अब रुक गई है आ के कहानी तेरी हाँ पर,
अर्मान मेरे दिल में मेरे यार बहुत हैं।


जलवानुमा है हुस्न जो पाकीज़: करदे दिल,
यूँ तो गुदाज़ हुस्न के बाजार बहुत हैं।


-अमित (दिसम्बर,’९१)
जुल्फ-ओ-लब-ओ-रुख़्सार = केश और ओष्ठ और कपोल (गाल)। फ़राख़-दिल = विशाल हृदय। लब-ओ-सागर = ओष्ठ और मदिरापात्र।

1 comment:

SANJEEV MISHRA said...

चुपके से देखते हैं दिखावा नहीं करते,
मासूम न कह देना वो हुशियार बहुत हैं।

भाई अमिताभ जी , प्रशंसा करने के लिए एक जिह्ववा कम पड़ रही है.
आपकी रचना के सामने प्रशंसा के सभी शब्द बौने हो गए हैं .
इसे केवल लफ्फाजी मत समझियेगा , ह्रदय के उदगार हैं ये .