Thursday, March 26, 2009

ग़ज़ल -जो मेरे दिल में रहा एक निशानी बनकर।

जो मेरे दिल में रहा एक निशानी बनकर।
आज निकला है वही आँख का पानी बनकर।

जिसपे लिक्खे थे कभी हमने वफ़ा के किस्से,
रह गया वो भी सफ़ा एक कहानी बनकर।

एक खु़शबू सी अभी तक जेहन में जिन्दा है,
कभी शेफाली, कभी रात की रानी बनकर।

आग का दरिया भी आया है नजर पानी सा,
दौर मुझपर भी वो गुजरा है जवानी बनकर।

होशियारी भी वहाँ काम नहीं आई ’अमित’,
लूटने वाला चला आया था दानी बनकर।

- अमित

7 comments:

Dr. Vijay Tiwari "Kislay" said...

amit ji achchhi gajal ke liye badhaai

जिसपे लिक्खे थे कभी हमने वफ़ा के किस्से,
रह गया वो भी सफ़ा एक कहानी बनकर।
- vijay

ashabd said...

सुंदर अभिव्‍यक्ति के लिए बधाई। उधार की पंक्तियों से आपका हौसला बुलंद करना चाहूंगा-

मेरा कद बौना करने में लोगों को उकसाने में
कितने लोगों की साजिश थी इक दीवार गिराने में

अनिल कान्त : said...

bahut khob bhai jaan ...behtreen

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

Parul said...

यूँ यकीं करता नहीं कोई उमूमन आपका
फिर भी बहरेशौक़ कुछ वादे निभाया कीजिये।
aapko ekavita pe padha...bahut badhiya...blog fursat se padhuungi poora aapka...

नीरज गोस्वामी said...

आग का दरिया भी आया है नजर पानी सा,
दौर मुझपर भी वो गुजरा है जवानी बनकर।
वाह...वा...लाजवाब शेर और पूरी की पूरी बेहतरीन ग़ज़ल...मेरी दिली मुबारकबाद कबूल फरमाएं...आप के ब्लॉग पर आ कर बहुत ही अच्छा लगा...
नीरज

डा. उदय ’ मणि ’ said...

जो मेरे दिल में रहा एक निशानी बनकर।
आज निकला है वही आँख का पानी बनकर।

वाह अमित जी वाह
बहुत ही खूबसूरत गज़ल ,

बहुत बहुत बधाई

डा उदय मणि

dwij said...

आपकी ग़ज़ल पसन्द आई


आग का दरिया भी आया है नजर पानी सा,
दौर मुझपर भी वो गुजरा है जवानी बनकर।