Friday, December 25, 2009

प्रसाद

जलती हैं हमारी हड्डियाँ
समिधा बन कर
हमारा ही श्रम बनता है
हविष्य
और प्रज्ज्वलित करते हैं उसे
हमारे ही श्रम-बिन्दु
घृत बन कर
पड़ता है, हमारे समर्पण का तुलसीदल
भोग की हर वस्तु में
लेकिन!
प्रसाद की कतार में
होते हैं सबसे बाद में
पहुँचते-पहुँचते जहाँ तक
हो जाता है रिक्त
थाल प्रसाद का।

अमित

3 comments:

अजय कुमार said...

achchhee rachanaa

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया!

Rama said...

डा.रमा द्विवेदी....

भावपूर्ण रचना....बधाई..