Saturday, July 11, 2009

ग़ज़ल - फिक्र आदत में ढल गई होगी।

फ़िक्र आदत में ढल गई होगी
अब तबीयत सम्हल गई होगी

गो हवादिस नहीं रुके होंगे
उनकी सूरत बदल गई होगी

जान कर सच नहीं कहा मैंने
बात मुँह से निकल गई होगी

मैं कहाँ उस गली में जाता हूँ
है तमन्ना मचल गई होगी

जिसमें किस्मत बुलन्द होनी थी
वो घड़ी फिर से टल गई होगी

खा़के-माजी की दबी चिंगारी
उसकी आहट से जल गई होगी

खता मुआफ़ के मुश्ताक़ नजर
बेइरादा फ़िसल गई होगी

मुन्तजिर मुझसे अधिक थी आँखें
बूँद बरबस निकल गई होगी

नाम गुम हो गये हैं खत से 'अमित'
उनको स्याही निगल गई होगी।


-अमित
मुश्ताक़ = उत्सुक, मुन्तजिर= प्रतीक्षारत, हवादिस= हादसा का बहुवचन
Mob: +919450408917

9 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

वाह कितनी सुंदर लाइनें है..

गो हवादिस नहीं रुके होंगे
उनकी सूरत बदल गई होगी

जान कर सच नहीं कहा मैंने
बात मुँह से निकल गई होगी.

सुंदर रचना बधाई!!!

ओम आर्य said...

moulik rachanaa ................atisundar abhiwyakti

M VERMA said...

मैं कहाँ उस गली में जाता हूँ
है तमन्ना मचल गई होगी
बहुत खूब -- तमन्ना भी खूबसूरती से मचली है.
सभी शेर सुन्दर

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा!!

mehek said...

मुन्तजिर मुझसे अधिक थी आँखें
बूँद बरबस निकल गई होगी
waah aafrin,lajawab gazal.

श्रद्धा जैन said...

जान कर सच नहीं कहा मैंने
बात मुँह से निकल गई होगी

मैं कहाँ उस गली में जाता हूँ
है तमन्ना मचल गई होगी

जिसमें किस्मत बुलन्द होनी थी
वो घड़ी फिर से टल गई होगी

मुन्तजिर मुझसे अधिक थी आँखें
बूँद बरबस निकल गई होगी

नाम गुम हो गये हैं खत से 'अमित'
उनको स्याही निगल गई होगी।

Puri gazal ki lajawab hai lekin ye sher to jaise saath liye jaa rahi hoon ji

कृष्ण मोहन मिश्र said...

नाम गुम हो गये हैं खत से 'अमित'
उनको स्याही निगल गई होगी।

bahut suner line hai.

Hum bhi allahabadi hain. kabhi hamari taraf bhi aayiye.

कृष्ण मोहन मिश्र said...

K M Mishra
www.kmmishra.tk

संजीव गौतम said...

अच्छी ग़ज़ल हुई है