Tuesday, July 28, 2009

कल बादल को कस कर डाँटा

रे कंजूस भला वर्षा में है तेरा क्या घाटा
कल बादल को कस कर डाँटा

आज सवरे इधर-उधर कुछ धुँधले बादल आये
कुछ फुहार के जैसी छोटी-छोटी बूँदे लाये
मैंने कहा कि निकले हो क्या करने सैर सपाटा?
उनको मैंने फिर से डाँटा

बाद दोपहर घिर आये कुछ बादल काले-काले
गरजे-तड़के बहुत देर पर खुले न उनके ताले
हुआ क्रोध से लाल खींच कर मारा एक झपाटा
अबकी बड़ी जोर से डाँटा

और शाम होते-होते फिर आई बुद्धि ठिकाने
सचमुच भीग गया मैं नभ पर लगे मेघ घहराने
आँख खुली, पत्नी गुस्से में, क्यों मारा था चांटा?
अब मैं खींच गया सन्नाटा

आँखें मल कर वस्तुस्थिति को समझा और बताया
अनावृष्टि ने मन पर मेरे था अधिकार जमाया
किसी तरह समझाकर मैंने पत्नी का भ्रम काटा
उनका ज्वार हुआ तब भाटा
कल बादल को कस कर डाँटा।

3 comments:

समयचक्र : महेन्द्र मिश्र said...

बादलो को डांट अच्छी लगी ...... फिर कसके गीला किया . गजब की सोच से लबरेज रचना .

संगीता पुरी said...

मजेदार रचना !!

Science Bloggers Association said...

अरे भई, पहले डांटना था, कम से बरसात में इतनी देर तो न करता।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }