Wednesday, January 20, 2010

हे! हिन्दी के रुद्रावतार! वन्दन है!

आज बसन्त पंचमी है। महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' जी का जन्म-दिन। निराला जी के जन्मवर्ष और दिन के बारे में ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है लेकिन जन्मदिन उनका बसंत को ही मनाया जाता है। आज के ही दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती जी की पूजा होती है। शिक्षण संस्थाओं मे विशेष रूप से। बंगाल में इसे बहुत समारोह पूर्वक मनाते हुये मैने देखा था।
यह दिन सरस्वती के इस वरदपुत्र का भी जन्मदिन हैं। महाप्राण के प्रति श्रद्धा के कुछ शब्द बन गये हैं उन्हे आपके सम्मुख रख कर उस महामनीषी के प्रति मैं अपनी कृतज्ञता ज्ञापित कर रहा हूँ। स्पष्ट कर दूँ कि, उस व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने के लिये मेरी कलम बहुत छोटी है।

हे! हिन्दी के रुद्रावतार!
भाषानिधि अम्बुधि महाकार
कविता-नवीन के शिल्पकार
जीवनी शक्ति जो दुर्निवार
अर्पित तुमको यह पुष्पहार
चन्दन है!

गंगा-यमुना उच्छ्‍वसित धार
कहती निजस्मृति को उघार
तुमसे भवाब्धि भी गया हार
हे पुरुष केशरी नमस्कार
करता युग तुमको बार-बार
वन्दन है!

जड़ता-गज-मस्तक पर प्रहार
कर, सिंहनाद सा स्वर उचार
वह नई चेतना, नव प्रसार
कविता जब पहुँची दीन-द्वार
स्लथ भिक्षुक की बेबस पुकार
क्रन्दन है!

उद्भट ज्ञानी थे तुम भगवद्गीता के
देखे कैसे रामाभ नयन सीता के
झेले थे तुमने विरह स्वपरिणीता के
संतप्त-शोक निज-कन्या सुपुनीता के
कवि अश्रु तुम्हारा, अश्रु नहीं
अंजन है!

हे! सरस्वती के पुत्र, स्वयं चतुरानन
ने गढ़ा तुम्हे देकर गर्वीला आनन
लेखनी-विराजे आकर स्वयं गजानन
वपु जैसे कवि का रूप धरे पंचानन
बिखरी कविता-कौमुदी-कीर्ति जिस कानन
नन्दन है!

हे! हिन्दी के रुद्रावतार
वन्दन है!


अमित

6 comments:

Udan Tashtari said...

निराला जी के जन्म दिवस पर उनकी पुण्य आत्मा को नमन.

बसंत पंचमी की बधाई.

राहुल प्रताप सिंह राठौड़ said...

बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं

गिरिजेश राव said...

महाप्राण को श्रद्धांजलि।
प्रात:बेला में आप ने धन्य कर दिया।
सही कहूँ तो आप से यही आशा थी। प्रयाग गोष्ठी की 'हिन्दी उर्दू' वाली काव्य रचना अभी भी कानों में गूँज रही है।
आभार बन्धु।

अभिनव said...

आदरणीय आमितजी, अद्भुत.. मेरे पास शब्द नहीं हैं कि मैं आपकी इस रचना के विषय में कुछ कहूं.

आदरणीय सोम ठाकुर जी एक बार निराला जी का एक संस्मरण सुना रहे थे. बात उन दिनों कि है जब कि निरालाजी अस्वस्थ चल रहे थे. ऐसे में एक दिन कुछ कवि और एक कवयित्री उनके दर्शन को पहुंचे. मैं नाम भूल गया हूँ. निराला जी उस समय अपने में ही खोये खोये रहते थे. जब निरालाजी नें इन लोगों को देखा तो थोड़ी देर बाद उठ कर वे घर के अन्दर चले गए. कुछ समय बाद वे बाहर आये तो उनके हाथ में एक पुरानी सी साडी थी. एक मुड़ा तुड़ा सा पांच रूपए का नोट उस साड़ी पर रखा था. निराला जी नें वो साड़ी और नोट उस कवयित्री कि और बढ़ाते हुए कहा कि, 'आप पहली बार मेरे घर आयीं हैं. आप मेरी बहन हैं. मेरे पास अभी यही है, कृपया इसको स्वीकार करें.' ऐसे थे हमारे निराला जी. इतना कह कर सोमजी भावुक हो गए. और इतना लिख कर मैं भी भावुक हो गया हूँ अतः एक बार पुनः धन्यवाद्.

हिमांशु । Himanshu said...

मैंने यह अनुभव बार-बार किया इस कविता को पढ़ते हुए जैसे निराला ने हाथ पकड़कर लिखवा दी हो यह कविता । निराला की कविता का स्वभाव यहाँ दिख गया मुझे ।

वसंत पंचमी की शुभकामनायें ।

दिगम्बर नासवा said...

निराला जी के जनम दिन पर सुंदर रचना .... आपको बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ .......