Monday, January 25, 2010

अहम की ओढ़ कर चादर

अहम की ओढ़ कर चादर
फिरा करते हैं हम अक्सर

अहम अहमों से टकराते
बिखरते चूर होते हैं
मगर फिर भी अहम के हाथ
हम मजबूर होते हैं
अहम का एक टुकड़ा भी
नया आकार लेता है
ये शोणित-बीज का वंशज
पुनः हुंकार लेता है
अहम को जीत लेने का
अहम पलता है बढ़-चढ़ कर
अहम की ओढ़ कर .....

विनय शीलो में भी अपनी
विनय का अहम होता है
वो अन्तिम साँस तक अपनी
वहम का अहम ढोता है
अहम ने देश बाँटॆ हैं
अहम फ़िरकों का पोषक है
अहम इंसान के ज़ज़्बात का भी
मौन शोषक है
अहम पर ठेस लग जाये
कसक रहती है  जीवन भर
अहम की ओढ़ करे चादर ...

-- अमित

13 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत शानदार एवं प्रवाहमय!

दिगम्बर नासवा said...

लाजवाब है आपका अहम पुराण ....... सच है इस पर जीतना आसान नही ........

sada said...

बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

अहम्‌ पर बहुत ही अहम कविता।
इससे पार पाने का रास्ता क्या है? आपके अनुसार तो यह सब जगह समाया है।

anitakumar said...

लाजवाब

प्रबल प्रताप सिंह् said...

happy birthday...!!

श्रद्धा जैन said...

bahut hi saar purn kavita hai
har shabad sach
gahri soch

Udan Tashtari said...

अमित जी, आपको जन्म दिन की शुभकामना यहाँ दे देते हैं.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

bahut sundar man ko chhuti rachna.....

अमित said...

प्रबल प्रताप जी एवम्‌ समीर लाल जी,
आपने जन्मदिन की शुभकामना यहाँ पर दी तो मैं सोचता हूँ आभार भी यहीं पर व्यक्त कर दूँ। अपना आशीर्वाद यूँ ही बनाये रखिये।
सादर
सिद्धार्थ जी,
इससे पार पाने का रास्ता होता तो अवश्य बताता। फिलहाल इससे सावधान रहना चाहिये। सावधानी ही बचाव है। मेरी समझ में इतना ही आता है।

हिमांशु । Himanshu said...

बेहद सशक्त रचना ! आभार ।

Rajey Sha said...

वाकई अहं की कहानी बहुत ही लम्‍बी है।

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

ये शोणित-बीज का वंशज
पुनः हुंकार लेता है
अहम को जीत लेने का
अहम पलता है बढ़-चढ़ कर
अहम की ओढ़ कर .....
वाह आध्यात्मिक बिम्ब अदभुत है
सरित प्रवाह मई रचना हिंदी कविता है