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एक रवायती (पारंपरिक) ग़ज़ल प्रस्तुत है|
यूँ चम्पई रंगत प सिंदूरी निखार है
इंसानी पैरहन में गुले-हरसिंगार है।
धानी से दुपट्टे में बसंती सी हलचलें
मौज़े-ख़िरामे-हुस्न कि फ़स्ले-बहार है।
गुजरा है कारवाने-क़ायनात इधर से
ये कहकशाँ की धुन्ध भी मिस्ले-गुबार है।
जिस पर भी पड़ गयी है निगहे-नाज़े-सरसरी
इंसाँ नियाजे-हुस्न का उम्मीदवार है।
आतिश जले कहीं भी पहुँचते हैं फ़ित्रतन
दीवानगी का अहद भी परवानावार है।
क्यूँ हुस्न प लगती रही पाक़ीज़गी की शर्त
पूछा कभी कि इश्क़ भी परहेजगार है।
इतने क़रीब से भी न गुजरे कोई 'अमित'
गो आग बुझ भी जाय प रहता शरार है।
अमित
शब्दार्थ:
पैरहन = वस्त्र, मौज़े-ख़िरामे-हुस्न = सौन्दर्य के चाल की तरंग, फ़स्ले-बहार= बसन्त
निगहे-नाज़े-सरसरी = मान से उक्त सरसरी निगाह,कहकशाँ= आकाश गंगा, मिस्लेगुबार = गुबार की तरह
नियाजे-हुस्न = हुस्न की कृपा, फ़ित्रतन = स्वाभाविक रूप से, अहद = प्रतिज्ञा, परवानावार = परवानो की तरह
पाक़ीज़गी = पवित्रता, परहेजगार= संयमी, शरार = चिंगारी।
हम अपने हक़ से जियादा नज़र नहीं रखते
चिराग़ रखते हैं, शम्सो-क़मर नहीं रखते।
हमने रूहों पे जो दौलत की जकड़ देखी है
डर के मारे ये बला अपने घर नहीं रखते।
है नहीं कुछ भी प ग़ैरत प आँच आये तो
सबने देखा है के कोई कसर नहीं रखते।
इल्म रखते हैं कि इंसान को पहचान सकें
उनकी जेबों को भी नापें, हुनर नहीं रखते।
बराहे-रास्त बताते हैं इरादा अपना
मीठे लफ़्जों में छुपा कर ज़हर नहीं रखते।
हम पहर-पहर बिताते हैं ज़िन्दगी अपनी
अगली पीढ़ी के लिये मालो-ज़र नहीं रखते।
दिल में आये जो उसे कर गुज़रते हैं अक्सर
फ़िज़ूल बातों के अगरो-मगर नहीं रखते।
गो कि आकाश में उड़ते हैं परिंदे लेकिन
वो भी ताउम्र हवा में बसर नहीं रखते।
अपने कन्धों पे ही ढोते हैं ज़िन्दगी अपनी
किसी के शाने पे घबरा के सर नहीं रखते।
कुछ ज़रूरी गुनाह होते हैं हमसे भी कभी
पर उसे शर्म से हम ढाँक कर नहीं रखते।
हर पड़ोसी की ख़बर रखते हैं कोशिश करके
रूसो-अमरीका की कोई ख़बर नहीं रखते।
हाँ ख़ुदा रखते हैं, करते हैं बन्दगी पैहम
मकीने-दिल के लिये और घर नहीं रखते।
घर फ़िराक़ और निराला का, है अक़बर का दियार
'अमित' के शेर क्या कोई असर नहीं रखते।-
अमितशब्दार्थःशम्सो-क़मर = सूरज और चन्द्रमा, बराहे-रास्त = सीधे - सीधे, शाने = कन्धे, पैहम = लगातार, मकीने-दिल = दिल का निवासी।
तुम मुझको उद्दीपन दे दो गीतों का उपवन दे दूँगा
थोड़ा सा अपनापन दे दो मैं सारा जीवन दे दूँगा।
मेरा तुमको कुछ दे देना जगप्रचिलित व्यापार नहीं है
और अपेक्षा रखना तुमसे बदले का व्यवहार नहीं है
जैसे यदि आराधन देदो श्रद्धासिक्त सुमन दे दूँगा।
तुम मुझको उद्दीपन दे दो ... ... ...
दुस्साहस भी कर सकता हूँ यदि तुम सम्बल देती जाओ
श्रम-सीकर से भय ही कैसा बस तुम आँचल झलती जाओ
सच कह दूँ संकेत मात्र पर तारों भरा गगन दे दूँगा।
तुम मुझको उद्दीपन दे दो ... ... ...
कमल कपूर भाँति उर मेरा कोमल और अग्नि शंकित है
जिस पर काला सा अतीत और धुंधला सा भविष्य अंकित है
यदि इसका अभिसार कर सको युग-प्रवाह नूतन दे दूँगा।
तुम मुझको उद्दीपन दे दो ... ... ...
-अमित (१९८५-८६)
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मेरी रचनाये (
http://amitabhald.blogspot.com)
(१)
अप्रासंगिक
पुरानी परिपाटी
जीवन साथी
(२)
पीढ़ी-अन्तर
मैकडॉनल पिज़्ज़ा
चुपड़ी रोटी
(३)
अपराधी हैं?
सुरक्षित विहार
ये कारागार
(४)
धोबी की हत्या
घर का मालिक है
धोबी का कुत्ता
(५)
एक शिकारी
दफ़्तर सरकारी
किसकी बारी?
(६)
राष्ट्रीय पक्षी
देखो! राष्ट्रीय पशु
क्या है आदमी?
(७)
पुलिस आई
कुत्तों ने जेबें सूँघी
पुलिस गई
(८)
चैनल सन्त
चमत्कार अनन्त
दुखी का अन्त
(९)
गुरू घन्टाल
छन रहा है माल
चेला बेहाल
(१०)
खोमचेवाला
लगी है टकटकी
गर्ल्स हॉस्टल
ड्राइंग रूम में अपना एक चित्र लगाया है
जो मुझे आकर्षक दिखाता है
पर मेरे जैसा नहीं दिखता
एक तख्ती दरवाजे पर
उपाधियां दर्शाती है, मेरी
जिन्हें मैं जानता हूँ कि कागजी हैं
और ओढे रहता हूँ एक गंभीरता
कि लोग बहुत नजदीक न आ जाँय
जान लें मेरी वास्तविकता
लेकिन कभी-कभी सोचता हूँ
कि देंखूं
इन सबके बिना
मैं कैसा लगता हूँ|
सबको तुम अच्छा कहते हो, कानो को प्रियकर लगता है
अच्छे हो तुम किन्तु तुम्हारी अच्छाई से डर लगता है।
सुन्दर स्निग्ध सुनहरे मुख पर पाटल से अधरों के नीचे
वह काला सा बिन्दु काम का जैसे हस्ताक्षर लगता है।
स्थितियाँ परिभाषित करती हैं मानव के सारे गुण-अवगुण
मकर राशि का मन्द सूर्य ही वृष में बहुत प्रखर लगता है।
ज्ञानी विज्ञानी महान विद्वज्जन जिसमें कवि अनुरागी
वाणी के उस राजमहल में कभी-कभी अवसर लगता है।
विरह-तप्त व्याकुल अन्तर को जब हो प्रियतम-मिलन-प्रतीक्षा,
हर कम्पन सन्देश प्रेम का हर पतंग मधुकर लगता है।
अमित
सुख-दुख आना-जाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।
सुख की है कल्पना पुरानी
स्वर्गलोक की कथा कहानी
सत्य-झूठ कुछ भी हो लेकिन
है मन को भरमाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।
सुख के साधन बहुत जुटाये
सुख को किन्तु खरीद न पाये
थैली लेकर फिरे ढूँढते
सुख किस हाट बिकाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।
आस-डोर से बँधी सवारी
सुख-दुख खीचें बारी-बारी
कहे कबीरा दो पाटन में
सारा जगत पिसाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।
वनवासी जीवन में सुख था
शशिमुख के आगे रवि मुख था
किन्तु स्वर्ण-मृग की इच्छा में
लंका हुआ ठिकाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।
दुखमय जगत काल की फाँसी
देख कुमार हुआ सन्यासी
शोध किया तो पाया तृष्णा-
पीछे जग बौराना साथी
सुख-दुख आना-जाना।
जब-जब किया सुखों का लेखा
सुख को पता बदलते देखा
किन्तु सदा ही इसके पीछे
दुख पाया लिपटाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।
जीवन की अनुभूति इसी में
द्वेष इसी में प्रीति इसी में
इसी खाद-पानी पर पलकर
जीवन कुसुम फुलाना साथी
सुख-दुख आना-जाना।
हे मानस के हंस तुम्हारा वंदन।
गलित रूढियों के दल-दल में
डूबा था जग सारा
मानस का उपहार ललित देकर
तब हमे उबारा
लोकनीति, मर्यादा रक्षण
काटे जो भवबन्धन
हे मानस के हंस तुम्हारा वंदन।
विनययुक्त दी विनयपत्रिका
गीतावलि प्रभुलीला
पूर्वपीठिका मानस की ज्यौं
कवितावली सुशीला
स्वयं तिलक लगवाने आये थे
तुमसे रघुनन्दन
हे मानस के हंस तुम्हारा वंदन।
रामचरित लीला का तुमने
प्रचलन किया जगत में
शैव और वैष्णव भक्तों को
किया एक पंगत में
उपकृत आज समाज तुम्हारा
करता है अभिनन्दन
हे मानस के हंस तुम्हारा वंदन।
गूढ़ दार्शनिक तत्वों को
जब सरल शब्द में ढाला
इक भदेस भाषा ने पाया
अमृतरस का प्याला
घूम रहा है धर्मध्वजा लेकर
अब तक वह स्यंदन
हे मानस के हंस तुम्हारा वंदन।
माता-पिता विहीन, तिरष्कृत
बाल्यकाल कठिनाई
गुरु का कृपा प्रसाद, ज्ञान के
साथ काव्य निपुनाई
जिसे किया स्पर्श
सुवासित हुआ कि जैसे चंदन
हे मानस के हंस तुम्हारा वंदन।
रे कंजूस भला वर्षा में है तेरा क्या घाटा
कल बादल को कस कर डाँटा
आज सवरे इधर-उधर कुछ धुँधले बादल आये
कुछ फुहार के जैसी छोटी-छोटी बूँदे लाये
मैंने कहा कि निकले हो क्या करने सैर सपाटा?
उनको मैंने फिर से डाँटा
बाद दोपहर घिर आये कुछ बादल काले-काले
गरजे-तड़के बहुत देर पर खुले न उनके ताले
हुआ क्रोध से लाल खींच कर मारा एक झपाटा
अबकी बड़ी जोर से डाँटा
और शाम होते-होते फिर आई बुद्धि ठिकाने
सचमुच भीग गया मैं नभ पर लगे मेघ घहराने
आँख खुली, पत्नी गुस्से में, क्यों मारा था चांटा?
अब मैं खींच गया सन्नाटा
आँखें मल कर वस्तुस्थिति को समझा और बताया
अनावृष्टि ने मन पर मेरे था अधिकार जमाया
किसी तरह समझाकर मैंने पत्नी का भ्रम काटा
उनका ज्वार हुआ तब भाटा
कल बादल को कस कर डाँटा।
फ़िक्र आदत में ढल गई होगी
अब तबीयत सम्हल गई होगी
गो हवादिस नहीं रुके होंगे
उनकी सूरत बदल गई होगी
जान कर सच नहीं कहा मैंने
बात मुँह से निकल गई होगी
मैं कहाँ उस गली में जाता हूँ
है तमन्ना मचल गई होगी
जिसमें किस्मत बुलन्द होनी थी
वो घड़ी फिर से टल गई होगी
खा़के-माजी की दबी चिंगारी
उसकी आहट से जल गई होगी
खता मुआफ़ के मुश्ताक़ नजर
बेइरादा फ़िसल गई होगी
मुन्तजिर मुझसे अधिक थी आँखें
बूँद बरबस निकल गई होगी
नाम गुम हो गये हैं खत से 'अमित'
उनको स्याही निगल गई होगी।
-अमित
मुश्ताक़ = उत्सुक, मुन्तजिर= प्रतीक्षारत, हवादिस= हादसा का बहुवचन
Mob:
व्याप्त है विपुल हर्ष
कविता कोश ने पूर्ण किये तीन वर्ष
कविता का यह महासागर
बनने को उद्यत है
हिन्दी काव्य का विश्वकोश।
वह दिन दिखता है मुझे
हस्तामलक समान
जब कविता कोश में होगा
काव्य की हर जिज्ञासा का समाधान।
बधाई! उन सभी को
जिनके प्रयत्नो का सुफल
हुआ मूर्तिमान।
उनको है नमन, उनकी वन्दना
उनका सारस्वत सम्मान
बहुत कुछ किया आपने पर
बहुत कुछ अब भी है शेष
जिसके लिये हम सभी की
शुभकामानायें हैं अशेष
इस महायज्ञ में हम भी सहभागी हैं
समिधा और हविस्य लेकर
जितनी जिसकी है सामर्थ्य सर्वस्व लेकर
हमारी मंगल कामनायें!
एक दिन हम कविता कोश को
हिन्दी-काव्य का विश्वकोश बनायें
सादर
अमित
Mob:
भोर जल्द भाग गई लू के डर से
साँझ भी निकली है बहुत देर में घर से
पछुँआ के झोकों से बरसती अगिन
गर्मी के दिन।
पशु-पक्षी पेड़-पुष्प सब हैं बेहाल
सूरज ने बना दिया सबको कंकाल
माँ चिड़िया लाती पर दाने बिन-बिन
गर्मी के दिन।
हैण्डपम्प पर कौव्वा ठोंक रहा टोंट
कुत्ता भी नमी देख गया वहीं लोट
दुपहरिया बीत रही करके छिन-छिन
गर्मी के दिन।
बच्चों की छुट्टी है नानी घर तंग
ऊधम दिन भर, चलती आपस की जंग
दिन में दो पल सोना हो गया कठिन
गर्मी के दिन।
शादी बारातों का न्योता है रोज
कहीं बहूभोज हुआ कहीं प्रीतिभोज
पेट-जेब दोनों के आये दुर्दिन
गर्मी के दिन।
गर्मी के दिन।
-अमित